नंदितेश निलय का कॉलम:अब बातें करनी हों तो फोन उठाइए नहीं, उसे एक तरफ रख दीजिए

Aug 26, 2026 - 06:28
नंदितेश निलय का कॉलम:अब बातें करनी हों तो फोन उठाइए नहीं, उसे एक तरफ रख दीजिए
क्या आपको भी ऐसा लगता है कि कई बार आपसे बात करते वक्त सामने वाला व्यक्ति आपसे ज्यादा अपने फोन को देखता रहता है? घर में भी कोई व्यक्ति आपसे बात करते-करते ही अपने मोबाइल फोन में व्यस्त हो जाता है। इसके लिए एक शब्द ईजाद कर लिया गया है- "फबिंग'। यह फोन और स्नबिंग (नजरअंदाज करना) से मिलकर बना है और यह आजकल सामाजिक रिश्तों और सम्प्रेषण पर गहरा असर छोड़ रहा है। शारीरिक रूप से मौजूद होकर भी भावनात्मक रूप से दूर रहने की यह प्रवृत्ति क्या बताती है? स्क्रॉल करती हुई उंगलियां और स्क्रीन में डूबी हुई आंखें यह यकीन नहीं कर पातीं कि उनके पास कोई और भी बैठा है, जो उनसे बात कर रहा है और उनका ध्यान चाहता है। आपके समक्ष ही किसी का अपने फोन में गुम हो जाना या बार-बार फोन देखते रहना यह बताता है कि यह छोटा-सा यंत्र अब सभी वार्तालापों और मुलाकातों पर हावी हो रहा है। फोन और एआई ने मिल-जुलकर हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल तो दिया ही है। नहीं तो यह किसने सोचा था कि घर, ऑफिस या क्लासरूम में भी फोन की उपस्थिति सभी पर भारी पड़ सकती है। हमें तो यह सिखाया जाता है कि जब कोई बात करे तो उस व्यक्ति को ध्यान और सम्मान से सुनना एक बुनियादी शिष्टाचार है। लेकिन यह भी सच है कि "फबिंग' के दौर में कोई नहीं सोचता कि उसका यह व्यवहार किसी को हर्ट कर सकता है। और जब यह आदत घर से लेकर संस्थाओं तक आम हो जाए तो फिर समाज में व्यक्ति और उसके संबंध के भावनात्मक पहलू पर गहरी चोट लगती है। "फबिंग' वस्तु नहीं व्यक्ति की अनदेखी कर एक "न्यू नॉर्मल' सामाजिक व्यवहार बना देता है। हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई कहानियां जरूर होती हैं और रिश्तों में बातचीत उन कहानियों का ही हिस्सा होती है। चूंकि अपनी बात कहते वक्त कोई व्यक्ति पूर्ण रूप से खो जाता है तो वह यह भी चाहता है कि सामने वाला व्यक्ति भी उसके भावों और शब्दों पर इतनी ही तवज्जो दे, उसका ध्यान इधर-उधर न भटके। आपने भी घरों में महसूस किया होगा कि बच्चे कई बार माता-पिता को सुनते वक्त अपना अधिकतर ध्यान फोन पर उस गतिविधि में लगाए रहते हैं, जो प्राय: बिल्कुल अनावश्यक होती है। तो क्या "फबिंग' हमारी भावनात्मक कहानियों को भी बेजान कर देगा? शायद हां। हाल ही में एक अध्ययन हुआ, जिसमें पढ़ने वालों को छह लघु कहानियां दी गईं। उसमें से तीन कहानियां इंसानों ने लिखीं और तीन चैटजीपीटी की बनाई हुई थीं। एआई के द्वारा लिखी गई कहानियों की थीम भी इंसानों वाली कहानियों जैसी ही थी। लेकिन जब पाठकों को रोचकता के आधार पर उन कहानियों को रेट करने को कहा गया तो एआई से बनी कहानियों को ज्यादा रेटिंग मिली। यह पैटर्न बताता है कि सामाजिक सम्प्रेषण में "फबिंग' के आ जाने ने रिश्तों और उनकी कहानियों के भावनात्मक पक्ष को कमजोर कर दिया है। और यह भी कि हमारे पूर्वजों ने गर्दन को सीधी करके ही सभ्यताओं के विकास की कहानी को अंजाम दिया था। लेकिन हमारे दो आजाद हाथ अब फिर से बंध चुके हैं और सीधी गर्दन फोन को निहारती हुई फिर से झुक चुकी है। आजाद कराने की कोशिश कीजिए खुद को और उनको जो इस फेर में सबकुछ को नजरअंदाज कर परतंत्र बने हुए हैं। अगर कोई फोन में व्यस्त होकर आपको नजरअंदाज कर भी रहा हो तो उनके प्रति कोई "फबिंग' का भाव न रखिए। उनसे बातें करने की कोशिश करते रहिए। तभी घरों में, संस्थाओं में फोन से रिहा आंखें, कान और मन मनुष्यत्ता को "फबिंग' के ग्रहण से बचाएंगे। (ये लेखक के अपने विचार हैं)