नवनीत गुर्जर का कॉलम:आंदोलन में मीम्स और कार्टून ऐसे सरपट दौड़े कि उनकी गति मापना मुश्किल हो गया

Jul 30, 2026 - 06:45
नवनीत गुर्जर का कॉलम:आंदोलन में मीम्स और कार्टून ऐसे सरपट दौड़े कि उनकी गति मापना मुश्किल हो गया
सबसे बड़ी दौलत क्या है? शिक्षा। ज्ञान। जीवन की इस सबसे महत्वपूर्ण निधि पर ही डाका पड़ने लगे तो परिणाम क्या होंगे? सही है, शिक्षा और ज्ञान का किसी डिग्री या किसी कॉम्पीटिटिव एग्जाम से ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नीट पेपरों का लीक होना बड़ी बात नहीं है! सरकार और सिस्टम की ये सबसे बड़ी विफलता है। आखिर बीस-बाइस लाख बच्चों के भविष्य का सवाल था। उनकी मेहनत के अकारथ जाने का सवाल था। किसी की एक साल की मेहनत। किसी की दो-तीन साल की मेहनत। कुछ तो इससे ज्यादा अटेम्प्ट करने वाले भी थे। इन सबके माता-पिता के सपने भी बार-बार टूटे, सो अलग! लेकिन नए बच्चों ने कर दिखाया। वो सरकार जो कभी झुकती नहीं थी, आखिर उसे झुकना पड़ा। देशभर से हजारों युवा जंतर-मंतर पहुंचे और उन्होंने पूरी दिल्ली और यहां की केंद्रीय सत्ता को हिलाकर रख दिया। कह सकते हैं ये गुस्सा केवल नीट पेपर-लीक को लेकर नहीं था, इस गुस्से में और भी बहुत कुछ शामिल था। युवाओं का यह गुस्सा कई अलग बातों और उनकी गहराइयों की तरफ इशारा कर रहा है। देर से ही सही, केंद्र सरकार ने इस गुस्से को समझ लिया या कहना चाहिए कि यह समझ उसकी मजबूरी रही। सरकार अच्छी तरह जानती है कि 30 साल की उम्र तक के युवाओं की आबादी भारत में लगभग 75 करोड़ है, जो कि अमेरिका और यूरोपियन यूनियन की संयुक्त आबादी से भी ज्यादा है। केवल 15 से 29 वर्ष के युवाओं की आबादी ही 37 करोड़ है। हमारे देश की मजबूरी यह है कि हमारी कृषि आय सर्वाधिक दबाव में है। यही वजह है कि हमारे युवा ग्रामीण अर्थव्यवस्था से कहीं दूर जा रहे हैं। सेवा आधारित अर्थव्यवस्था हमारे युवाओं के अवसरों को शहरों की तरफ केंद्रित कर रही है। अजीब बात यह है कि ये शहर भी हमारे युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं दे पा रहे हैं। अब सवाल ये है कि विपक्ष को नाकारा साबित करने वाली सरकार इस जेन-जी के सामने झुकी क्यों? ये आंदोलन आधुनिक तकनीक से रचा-बसा था। मीम्स और कार्टून ऐसे सरपट दौड़ रहे थे कि जिनकी गति मापना मुश्किल हो गया था। फेसबुक, इंस्टा सब ऐसे भर गए थे, जैसे उनकी पैदाइश ही इस आंदोलन को परवान चढ़ाने के लिए हुई हो! बिहार में तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे युवाओं ने मिसाल कायम की। वे लाठियों के साथ तैनात पुलिस वालों के पास जाते और पूछते- पुलिस अंकल, लाठियां कब चलाओगे? वाटर कैनन कब मारोगे, हमें डांस करना है? आंसू गैस खत्म हो गई क्या? इसके अलावा सरकार के झुकने या आंदोलन के सफल होने के जो कुछ कारण स्पष्ट नजर आते हैं, वे है- इन बच्चों का राजनीति से ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं था। ये कोई किसान नहीं थे कि जंतर-मंतर पर आंदोलन करते रहने से पीछे इनकी फसलें सूख जातीं! इनकी कोई नौकरी या फैक्ट्रियां नहीं थीं कि इनके बैंक खाते खंगाले जाते। इनकम टैक्स या ईडी को पीछे लगाया जाता! किसी में कोई पद या कुर्सी पाने की लालसा भी नहीं थी कि कुछ लोगों को प्रलोभन देकर इनमें फूट डाली जाती! फिर इन नए बच्चों की भाषा और शैली भी सरकार या पुलिस या प्रशासन को समझ नहीं आ रही थी। आंदोलन के उनके पैंतरे भी एकदम नए थे। पुलिस उन्हें डंडे दिखाती तो वे राष्ट्रगान गाने लगते। कभी डंडे बरसाने वाले पुलिसकर्मियों पर वे फूल बरसा रहे थे। देश के कोने-कोने से उनके लिए मदद भेजी जा रही थी। कोई खाना भेज रहा था। कोई बाकी रसद या सामान। निश्चित ही इन सब गतिविधियों को देखकर सरकार ने छात्र आंदोलन से ही शुरू हुए जेपी के महा-आंदोलन की भी समीक्षा की ही होगी! यही वजह थी कि पहली बार आंदोलनकारियों की मांगें मानकर एक कैबिनेट मंत्री से इस्तीफा ले लिया गया। जेन-जी के आंदोलन की खास बात ये भी रही कि उन्होंने सोनम वांगचुक जैसे गंभीर व्यक्तित्व को आगे रखा। वांगचुक ही इस आंदोलन का ऐसा चेहरा थे, जो किसी दबाव के आगे झुक नहीं सकते थे और आखिर वे झुके भी नहीं। जंतर-मंतर पर लगा एक पोस्टर बहुत मौजू था- "हमारी शिक्षा व्यवस्था में दो ही चीजों की कमी है- पहली शिक्षा और दूसरी व्यवस्था!' इस गुस्से में बहुत कुछ था... कह सकते हैं ये गुस्सा केवल पेपर-लीक को लेकर नहीं था, इस में और भी बहुत कुछ शामिल था। यह गुस्सा कई अलग बातों और उनकी गहराइयों की तरफ इशारा कर रहा है। देर से ही सही, सरकार ने इस गुस्से को समझा या कहना चाहिए कि यह समझ उसकी मजबूरी रही।