नीरजा चौधरी का कॉलम:कर्नाटक में कांग्रेस ने अपनी पुरानी गलतियां नहीं दोहराईं
राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस जो नहीं कर पाई थी, कर्नाटक में उसने कर दिखाया। राजस्थान में पार्टी ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट को बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनाने का वादा किया था, लेकिन गहलोत ने इसे नहीं होने दिया। उन्होंने तो पार्टी को ही चुनौती दे दी थी। पार्टी आलाकमान पायलट को राजस्थान कांग्रेस का अध्यक्ष तक नहीं बना पाया है, ताकि वे 2028 के चुनाव में मुख्यमंत्री पद के स्वाभाविक उत्तराधिकारी बन सकें। इसी तरह छत्तीसगढ़ में जब पार्टी ने आधे कार्यकाल के लिए टीएस सिंहदेव को राज्य की कमान सौंपनी चाही तो ज्यादातर विधायकों का समर्थन लेकर बैठे भूपेश बघेल ने भी ऐसे प्रयास को नाकाम कर दिया था। इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस को गुटबाजी का खामियाजा भुगतना पड़ा और 2023 में वो सत्ता गंवा बैठी। इसके उलट, कर्नाटक में सत्ता हस्तांतरण शांति से हुआ। इसका श्रेय सिद्धारमैया को जाता है, जो अपने उपमुख्यमंत्री के लिए सीएम की कुर्सी छोड़ने पर राजी हो गए। किसी राजनेता के लिए ऐसा करना आसान नहीं होता। इस बार आलाकमान भी इसको लेकर स्पष्ट रहा कि वह क्या चाहता है। शीर्ष नेतृत्व में एकजुटता दिखी और अपना निर्णय मनवाने की दृढ़ता भी। दक्षिण में कांग्रेस के बढ़ते दबदबे को देखते हुए कर्नाटक को लेकर उसके दांव आज अधिक ऊंचे हैं। गहलोत और बघेल की तरह सिद्धारमैया के पास भी उनके समर्थक विधायकों का बहुमत था। लेकिन वे बगावत के बजाय हाईकमान के निर्देश का पालन करते नजर आए। भले उन्हें भविष्य में इसका सियासी फायदा मिले या नहीं, लेकिन उन्होंने अपनी साख जरूर बना ली है। वे जानते थे कि डी.के. शिवकुमार केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बना रहे थे। ऐसे में हालात सिद्धारमैया और डीकेएस के अलावा कांग्रेस के लिए भी उलझन भरे हो सकते थे। एक वक्त तो डीकेएस की भाजपा से भी नजदीकियां बढ़ने की खबरें आई थीं। शायद यह भी हाईकमान पर दबाव बढ़ाने के लिए ही होगा। सिद्धारमैया ने हाईकमान के बदले मूड को भी भांप लिया था। कुरुबा ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले सिद्धारमैया जनाधार वाले नेता हैं और ‘अहिंदा’ (पिछड़े, अल्पसंख्यक, दलित) गठबंधन के सूत्रधार माने जाते हैं, जिसने कांग्रेस को मजबूत स्थिति में बनाए रखा। इसी की बदौलत सिद्धारमैया दो बार विपक्ष के नेता बने और दो बार मुख्यमंत्री भी रहे। उनके सियासी कद और ओबीसी पहचान की वजह से ही राहुल गांधी लगातार उनका समर्थन करते रहे हैं। लेकिन अब कल यानी 3 जून को डीकेएस मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे और उनके नाम का प्रस्ताव सिद्धारमैया ने ही रखा। सिद्धारमैया के गद्दी छोड़ने का मतलब यह नहीं निकाला जा सकता कि वे राजनीति भी छोड़ रहे हैं। इसके उलट, उन्होंने संकेत दे दिया है कि वे एक विधायक के तौर पर कर्नाटक में सक्रिय रहेंगे। पार्टी ने उन्हें राज्यसभा सीट की पेशकश की थी, लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में जाने से इनकार कर दिया। हालांकि, यह कहना मुश्किल है कि यदि कांग्रेस उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की पेशकश करेगी तो वे उसे भी ठुकरा देंगे या नहीं। खरगे का कार्यकाल जल्द समाप्त होने वाला है और ऐसे में ओबीसी समुदाय से आने वाला कोई अध्यक्ष राहुल की राजनीति को नई गति दे सकता है। मुख्यमंत्री पद छोड़ने से कुछ घंटे पहले ही सिद्धारमैया ने कर्नाटक की जाति जनगणना को मंजूरी दे दी, जिसका आदेश उन्होंने ही 2025 में दिया था। ऐसा करके उन्होंने डीकेएस के सामने एक कठिन सियासी चुनौती छोड़ दी है। यदि डीकेएस इसे स्वीकार करते हैं, तो उनका अपना वोक्कालिगा समुदाय नाराज हो सकता है। यदि इसे ठंडे बस्ते में डालते हैं तो ओबीसी समुदाय नाराज होकर फिर सिद्धारमैया के पक्ष में लामबंद हो सकता है। कर्नाटक का उदाहरण बताता है कि कांग्रेस में निर्णय करने की बात आए तो राहुल और प्रियंका अब अधिक तालमेल के साथ काम कर रहे हैं। इससे दक्षिण भारत में कांग्रेस ने खुद को और मजबूती ही प्रदान की है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)