नीरजा चौधरी का कॉलम:पंजाब को लेकर भाजपा की रणनीति अब बदल रही है
आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के भाजपा में चले जाने से पंजाब का मोर्चा हालिया विधानसभा चुनावों का शोर थमने से पहले ही खुल गया है। ध्यान रहे कि ‘आप’ राज्यसभा में चौथी सबसे बड़ी पार्टी थी। एक दशक पहले ही बनी एक नई पार्टी के लिए यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं। इसकी तुलना में शरद पवार की एनसीपी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के पास भी राज्यसभा में एक-एक ही सांसद हैं। लेकिन सात सांसद निकलने के बाद अब राज्यसभा में ‘आप’ के तीन ही सदस्य बचे हैं। ‘आप’ इस पाला-बदल को अदालत में चुनौती देने की योजना बना रही है। जब तक अदालत इन सात सांसदों के फैसले पर तत्काल रोक नहीं लगाती, वे भाजपा के सदस्य बने रहेंगे। अदालत के अंतिम फैसले तक तो यही स्थिति रहने वाली है। संभवत: तब तक उनका राज्यसभा का कार्यकाल भी समाप्त हो चुका होगा। अनुभव बताते हैं कि दल-बदल के मामले अदालतों में वर्षों चलते रहते हैं। भले ही इससे दल-बदल कानून की समीक्षा की जरूरत महसूस होने लगी हो, लेकिन फिलहाल तो इस घटनाक्रम का असर ‘आप’ के भविष्य, पंजाब में उसकी सरकार, केजरीवाल के नेतृत्व और पंजाब में भाजपा व कांग्रेस की स्थिति पर भी पड़ेगा। देखें तो राज्यसभा में भाजपा के खाते में सात सांसदों की बढ़ोतरी उसे खासी राहत देगी, लेकिन इसके बावजूद उसके पास सदन में अब भी बहुमत से 10 सीटें कम हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में पिछले साल मिली हार के बाद कमजोर दिख रही ‘आप’ को इस घटनाक्रम ने बड़ा झटका दिया है। इतने सांसदों के पाला बदलने से कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित होगा और केजरीवाल की पार्टी को एकजुट रखने की क्षमता पर सवाल उठेंगे। पंजाब में भी पार्टी के हौसले पर असर पड़ेगा, जहां अगले साल चुनाव होने वाले हैं। पंजाब में ‘आप’ के पास 117 में से 94 सीटों का मजबूत बहुमत है। पार्टी नेतृत्व अब इस बात को लेकर चिंतित है कि विधायकों को खरीद-फरोख्त से कैसे बचाया जाए। ‘आप’ विधायक सतर्क हैं और जानकारों की मानें तो वे एक-दूसरे पर नजर भी रख रहे हैं कि कौन-कौन राघव चड्ढा और भाजपा में गए नेताओं के संपर्क में हैं। पाला बदलने वाले चड्ढा और केजरीवाल के प्रमुख रणनीतिकार संदीप पाठक की अहमियत इसलिए नहीं है कि वे भाजपा के लिए जमीनी समर्थन जुटा लेंगे, क्योंकि वे जन-नेता तो हैं ही नहीं। हां, छात्रों और फर्स्ट टाइम वोटरों में चड्ढा का थोड़ा आकर्षण जरूर है। चड्ढा ने 2022 में पंजाब चुनाव की जिम्मेदारी संभाली थी और पाठक केजरीवाल के बेहद भरोसेमंद थे। यहां तक कि टिकट वितरण समेत अन्य सभी महत्वपूर्ण कामकाज तक भी वे देखते थे। इसलिए ये दोनों ही पंजाब में ‘आप’ के विधायकों को अच्छे से जानते हैं। बताया जाता है कि पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने कई विधायकों से संपर्क किया भी है। तो क्या वे पंजाब में ‘आप’ विधायकों में बगावत करवा सकते हैं? खासकर, जिन विधायकों को मंत्री या कोई अन्य पद नहीं मिला और जो असंतुष्ट हैं, उनमें? क्या इससे सरकार गिर सकती है और चुनाव से पहले राष्ट्रपति शासन लग सकता है? फिलहाल इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। यह भी सवाल पूछा जा सकता है कि क्या इन बदली परिस्थितियों में पंजाब की ‘आप’ में कोई ‘एकनाथ शिंदे’ हो सकता है, जो सियासी समीकरणों को बदल दे और भाजपा को इसका फायदा हो? खैर, ये सब तो अभी अटकलें ही हैं, लेकिन पंजाब में भाजपा के गेम प्लान को लेकर चर्चाएं जरूर अभी से शुरू हो चुकी हैं। भाजपा अब पारंपरिक जातीय समीकरणों पर निर्भर रहने के बजाय जनता के बीच मुद्दों को लेकर अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर सकती है। 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद उसने पंजाब में जमीन खो दी थी। उसका सबसे पुराना सहयोगी शिरोमणि अकाली दल उससे अलग हो गया। हालांकि, दोनों में बातचीत चलती रही है, लेकिन नतीजा नहीं निकल पाया। कुछ ही समय पहले तक भाजपा मान रही थी कि चूंकि 2027 के चुनाव तक वह पंजाब में मजबूत होने की स्थिति में नहीं है तो बेहतर होगा भगवंत मान ही सत्ता में बने रहें। क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि इस सीमावर्ती राज्य में कांग्रेस की वापसी हो। हालांकि ‘ऑपरेशन-7’ को अब पंजाब को लेकर भाजपा की रणनीति में बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी की सोच बदल रही है। यह सिर्फ राज्यसभा में ‘आप’ को तोड़ने का ही नहीं, बल्कि 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव में भाजपा को मजबूत दावेदार के तौर पर खड़ा करने की शुरुआत भी हो सकती है। कुछ समय पहले तक भाजपा मान रही थी कि पंजाब में भगवंत मान ही सत्ता में बने रहें तो बेहतर। वह नहीं चाहती थी कि इस राज्य में कांग्रेस की वापसी हो। लेकिन अब पंजाब को लेकर भाजपा की रणनीति में बदलाव आ रहा है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)