नीरज कौशल का कॉलम:केवल दक्षिण ही नहीं, देश के हर कोने में घट रही है आबादी
योजनाओं को बेहतर ढंग से आकार देने के लिए हमें विश्वसनीय जनसंख्या अनुमानों की आवश्यकता होती है। किंतु भारत के जनसांख्यिकीय अनुमान- जिन्हें स्वयं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) ने तैयार किया है- एक चिंताजनक कहानी बताते हैं। ये अनुमान संभवतः 10 करोड़ लोगों और कई दशकों तक की अवधि के संदर्भ में गलत सिद्ध हो सकते हैं। इसका दोष सरकार पर आता है, जिसने 2021 में जनगणना आयोजित नहीं की और उसके बाद वर्ष-दर-वर्ष उसे टालती रही। पिछली जनगणना 15 वर्ष पहले हुई थी। इसलिए सभी अनुमान एक पुरानी और अप्रासंगिक जनगणना के आंकड़ों पर आधारित रहे हैं। इस प्रक्रिया में, भारत ने भविष्य के 10 करोड़ संभावित नागरिकों को मानो परिदृश्य से बाहर कर दिया है- इनमें वे युवा उपभोक्ता और कामगार भी हैं, जो भारत की आर्थिक वृद्धि को गति देने वाले थे और देश को विकसित राष्ट्र बनाने में योगदान देने वाले थे। जिस डेमोग्राफिक डिविडेंड की हम लंबे समय से प्रतीक्षा कर रहे थे, वह अचानक विलुप्त होता प्रतीत हो रहा है। पुराने और अप्रचलित आंकड़ों पर आधारित अनुमानों के अनेक जोखिम और दुष्परिणाम होते हैं। 2011 की जनगणना पर आधारित यूएनडीपी के 2024 के अनुमानों के अनुसार भारत की जनसंख्या 2060 के दशक के प्रारम्भ में 1.7 अरब के शिखर पर पहुंचने वाली थी। किंतु हाल ही में जारी सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) 2024 के प्रजनन-दर संबंधी आंकड़ों पर आधारित नए अनुमानों से संकेत मिलता है कि भारत की जनसंख्या इससे कहीं पहले लगभग 1.6 अरब के पीक पर पहुंच जाएगी। यह 2060 के दशक में नहीं बल्कि 2040 के दशक के मध्य के आसपास होगा। इसके बाद इसमें गिरावट शुरू होगी, और संभवतः यह गिरावट उस गति से भी अधिक तीव्र होगी, जिस गति से जनसंख्या बढ़ी थी। एक निम्न-मध्यम आय वाला देश होने के बावजूद भारत का तीव्र जनसांख्यिकीय ट्रांजिशन अनेक समृद्ध देशों के अनुभव से मेल खाता है। हमारे सामने समृद्ध देशों जैसी चिंताएं तो हैं, पर उनकी समृद्धि नहीं है। 89 लाख लोगों के नमूने पर आधारित एसआरएस 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर- यानी एक महिला द्वारा अपने जीवनकाल में जन्मे गए बच्चों की औसत संख्या घटकर 1.9 रह गई है, जो जनसंख्या को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक स्तर से नीचे है। भारत का जनसांख्यिकीय ट्रांजिशन इतनी तेजी से आगे बढ़ा है कि देश के आठ राज्यों में प्रजनन दर 1.5 या उससे भी कम हो चुकी है- जो स्कैंडिनेवियाई देशों के स्तर के समान है। अब जबकि हमारे पास नए आंकड़े उपलब्ध हैं, वे अनेक भ्रमों को दूर कर रहे हैं। एसआरएस 2024 की रिपोर्ट उस व्यापक धारणा का खंडन करती है, जिसके अनुसार भारत की प्रजनन प्रवृत्तियां देश को दो स्पष्ट रूप से भिन्न क्षेत्रों में बांटती हैं- कम प्रजनन दर वाले दक्षिणी राज्य और उच्च प्रजनन दर वाले उत्तरी राज्य। वास्तविकता यह है कि हिंदी पट्टी के केवल चार राज्यों को छोड़कर पूरे देश में प्रजनन दर रिप्लेसमेंट रेट से नीचे पहुंच चुकी है। सबसे कम प्रजनन दर वाले राज्य देश के विभिन्न भागों में फैले हुए हैं : उत्तर और उत्तर-पश्चिम में दिल्ली (1.2), जम्मू-कश्मीर (1.5), पंजाब (1.5) और हिमाचल (1.5); पूर्व और पूर्वोत्तर में बंगाल (1.3), ओडिशा (1.7) और असम (2.0); पश्चिम में महाराष्ट्र (1.5), गुजरात (1.8); दक्षिण में केरल (1.4), तमिलनाडु (1.3), आंध्र (1.5) और कर्नाटक (1.5)। जिन सभी राज्यों के लिए एसआरएस ने आंकड़े जारी किए हैं, वहां प्रजनन दर में गिरावट दर्ज की गई है। इसलिए संभव है कि यदि सरकार परिसीमन की प्रक्रिया में 2011 की जनगणना के बजाय एसआरएस 2024 पर आधारित जनसंख्या अनुमानों का उपयोग करे, तब भी परिणामों में बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं होगा। फिर भी, सबसे नवीन उपलब्ध आंकड़ों का उपयोग करना अधिक उचित होगा। संभावना है कि भारत इस सदी का समापन 1 अरब से कम जनसंख्या के साथ करेगा। वर्ष 2000 में भारत की जनसंख्या संरचना एक आदर्श पिरामिड के समान थी, जिसकी बुनियाद में बड़ी युवा आबादी थी और शीर्ष पर अपेक्षाकृत कम वृद्ध जनसंख्या। किंतु 2100 तक हमारे पास सिकुड़ी हुई बुनियाद होगी। नए आंकड़े अनेक भ्रमों को दूर कर रहे हैं। एसआरएस 2024 की रिपोर्ट उस धारणा का खंडन करती है, जिसके अनुसार भारत की प्रजनन प्रवृत्तियां देश को दो स्पष्ट रूप से भिन्न क्षेत्रों में बांटती हैं- कम प्रजनन दर वाले दक्षिणी राज्य और उच्च प्रजनन दर वाले उत्तरी राज्य।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)