पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:आंतरिक नेत्रों से ही संभव है दिशाभ्रम का समाधान

Apr 28, 2026 - 06:29
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:आंतरिक नेत्रों से ही संभव है दिशाभ्रम का समाधान
आंखों को आंखों से देखने के लिए भी आईना लगता है। मेडिकल साइंस हमारी आंखों को केवल देखने, दिखाने से जोड़कर चलता है। अध्यात्म विज्ञान कहता है, दो आंखें भीतर भी होती हैं। शंकर जी की तीसरी आंख की बात तो छोड़ ही दें, लेकिन हम मनुष्य भीतर की आंखों को देखने के लिए नेत्र बंद करें, मौन साधें और ध्यान की दिशा में चलें। तब एहसास होगा कि भीतर भी नेत्र हैं। अब उनका क्या उपयोग? तुलसीदास जी ने दृश्य लिखा, काकभुशुंडि जी गरुड़ जी से कह रहे हैं– जब जेहि दिसि भ्रम होई खगेसा, सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा। हे पक्षीराज, जिसे दिशा भ्रम होता है तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिम में उदय हुआ है। दिशाभ्रम का अर्थ है– टोटल कन्फ्यूज्ड, दिग्भ्रम। इसमें दाएं-बाएं, आगे-पीछे, अंदर-बाहर की समझ चली जाती है। भूत, वर्तमान और भविष्य का घालमेल हो जाता है। विज्ञान इसे डिमेंशिया, अल्जाइमर का नाम देता है। तो काकभुशुंडि जी ने संकेत दिया है कि दिशा भ्रम अच्छे-अच्छों को हो जाता है। इसका निपटारा आंतरिक नेत्रों से ही हो सकेगा।