पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:मन को हटाने से ही वह स्पेस बनेगा, जो हमें शांत करता है

Jun 4, 2026 - 06:06
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:मन को हटाने से ही वह स्पेस बनेगा, जो हमें शांत करता है
जीवन में दु:ख आना और दु:खी हो जाना, ये दो अलग बातें हैं। ऐसा कोई दु:ख बना ही नहीं, जो बिना सुख के आए और ऐसा कोई सुख नहीं बना, जो बिना दु:ख के आए। ये दोनों एक साथ ही आते हैं। इनकी समझ का नाम ही इनकी मुक्ति है। एक शब्द है- स्पेस। इसका सीधा अर्थ होता है जगह बनाइए। हमारी भावनाओं में, हमारे विचार में एक स्पेस रखिए। विचार बाहर से आते हैं, सोच रहे होते हैं हम। फिर हम उस विचार से अपने पूरे व्यक्तित्व, अस्तित्व को जोड़ लेते हैं। ऋषि-मुनि कह गए हैं कि मनुष्य के शरीर और आत्मा को चिपकाने का काम मन करता है और जिसके शरीर और आत्मा जितने अधिक चिपके, वो उतना अशांत। जरा-सा मन को हटाइए, आत्मा शरीर में स्पेस आया और यहीं से हम शांत हुए। और मन केवल संकल्प से नहीं गिरता, इसे नियंत्रित करने की कोई औषधि भी नहीं है। मन का संचालन सांस से होता है। यदि प्राणायाम को प्रतिदिन बहुत गम्भीरता से लें, नियमित करें तो हमारी मन पर पकड़ बन जाएगी। और जब-जब हम मन को हटा देंगे, तब-तब वह स्पेस क्रिएट हो जाएगी, जो हमें शांत करती है।