पलकी शर्मा का कॉलम:एक और पड़ोसी मुल्क से रिश्तों में सूझबूझ हमारे लि​ए जरूरी

Aug 25, 2026 - 06:43
पलकी शर्मा का कॉलम:एक और पड़ोसी मुल्क से रिश्तों में सूझबूझ हमारे लि​ए जरूरी
बांग्लादेश हमारे लिए एक समस्या बना हुआ है और इसे नजरअंदाज करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। फिलहाल सबसे बड़ा मसला बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की प्रस्तावित भारत यात्रा है। भारत ने उन्हें औपचारिक निमंत्रण दे रखा है। बल्कि देखें तो फिलहाल दो निमंत्रण हैं- एक द्विपक्षीय यात्रा का और दूसरा ब्रिक्स समिट के लिए। फिर भी, हर दिन इस पर असमंजस और गहराता जा रहा है कि क्या रहमान भारत आएंगे? अगस्त के आखिर में उनके आने की उम्मीद थी। फिर शेख हसीना ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस की और नई सरकार पर बांग्लादेश को बर्बाद करने का आरोप लगाया। रहमान के मंत्रियों ने भी भारत पर हसीना को समर्थन देने का आरोप लगाया। तो यात्रा टल गई। अब रहमान के सलाहकार का कहना है कि भारत की उनकी पहली यात्रा द्विपक्षीय होनी चाहिए। इससे ब्रिक्स में उनकी भागीदारी की संभावना खत्म होती दिखती है। जबकि द्विपक्षीय यात्रा अभी भी अनिश्चित है। रहमान की यात्रा को लेकर यह असमंजस कई मायनों में दोनों देशों के बीच रिश्तों की अनिश्चितता का ही प्रतिबिम्ब है। इसका पहला नतीजा तो साफ है कि अब हसीना वाले दौर में वापस नहीं लौटा जा सकता। वह दोनों देशों के बीच असाधारण गर्मजोशी, भरोसे और सहयोग का दौर था। ढाका भारत का भरोसेमंद साझेदार था। तब हमारे बीच सुरक्षा सहयोग गहराया था, कनेक्टिविटी बढ़ी थी और राजनीतिक रिश्ते स्थिर रहे थे। अब समीकरण बदल गए हैं। बांग्लादेश के वोटर दक्षिणपंथ की ओर झुक गए हैं। आज वहां एक उदार और धर्मनिरपेक्ष पार्टी के लिए बहुत कम गुंजाइश बची है और वोटरों के एक हिस्से में भारत को लेकर संदेह बढ़ा है। हसीना राजनीतिक वापसी की बात करती तो हैं, लेकिन अभी यह नामुमकिन लगता है। शुरुआत में रहमान का रुख भारत के प्रति तर्कसंगत और संतुलित नजर आया था। लेकिन हाल के संकेत चिंताजनक हैं, खासकर पाकिस्तान के साथ काम करने की बांग्लादेश की बढ़ती इच्छा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उस गठजोड़ में ढाका की दिलचस्पी है, जिसे ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने एक पारस्परिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत इनमें से किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। बांग्लादेश ने अब कहा है कि इन तीन देशों से जुड़े किसी आर्थिक या रक्षा ढांचे में शामिल होने को लेकर उसका रुख सकारात्मक है। अगर ऐसा होता है तो 1971 के इतिहास और बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन के दौरान पाकिस्तानी सेना द्वारा किए नरसंहार के बावजूद ये दोनों एक ही सैन्य गठबंधन में आ सकते हैं। यह स्थिति रणनीतिक रूप से भी भारत के लिए असहज है। अभी यह कथित ‘इस्लामिक नाटो’ मूल रूप से पश्चिम एशिया का समूह है। इसके सुरक्षा संबंधी गुणा-भाग उसी क्षेत्र पर केंद्रित हैं और सीधे तौर पर यह भारत के खिलाफ नहीं दिखता। लेकिन जैसे ही बांग्लादेश इसका सदस्य बना, हालात बदल जाएंगे। तब यह समूह दक्षिण एशिया और संभवत: भारत के पूर्वी हिस्से तक आ पहुंचेगा। बांग्लादेश अपनी विदेश नीति में फैलाव ला रहा है और यह आगे भी जारी रहेगा। इस दूसरी हकीकत के लिए भी हमें तैयार रहना होगा। बांग्लादेश एक अहम रणनीतिक तटरेखा वाला 17.8 करोड़ लोगों का देश है और बीते दो दशकों में उसकी आर्थिक उन्नति की कहानी भी प्रभावशाली रही है। अमेरिका उससे जुड़ना चाहता है। चीन वहां अपना प्रभाव चाहता है। यूरोप भी उसमें हिस्सेदारी चाहता है। अब पश्चिम एशिया की ताकतें भी इस समीकरण में जुड़ रही हैं। हसीना के दौर में भी बांग्लादेश अपनी विदेश नीति में विविधता ला रहा था। रहमान के दौर में यह प्रक्रिया और तेज होने की उम्मीद है। भारत इसे रोक नहीं सकता। वह बांग्लादेश से यह उम्मीद नहीं कर सकता कि वह भारत को चुने और बाकी देशों को दूर रखे। लेकिन अपने हितों को आगे बढ़ाने और किसी ऐसे रणनीतिक विकल्प को अपनाने में फर्क है, जो सीधे भारत की सुरक्षा को प्रभावित करता हो। पाकिस्तान से सम्बद्ध और भारत के पूर्वी पड़ोस तक पहुंचने वाला कोई भी सैन्य समझौता दूसरी श्रेणी में ही आएगा। इसलिए हमें सावधानी भरा संतुलन बनाना होगा- दुश्मनी के बिना सतर्कता और आत्मसंतुष्टि के बिना जुड़ाव बनाते हुए। कुछ दिन पहले भारतीय उच्चायुक्त ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी चाहते हैं रहमान की भारत यात्रा ‘यादगार’ हो। शायद भारत पर्सनल डिप्लोमेसी पर भरोसा कर रहा है और यह बुरा आइडिया नहीं। क्योंकि राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद इस रिश्ते की बुनियाद अब भी मजबूत है। भारत का लक्ष्य पुराने बांग्लादेश को वापस पाना नहीं है। उसे ऐसे नए बांग्लादेश के साथ काम करने का रास्ता तलाशना है, जो ज्यादा स्वतंत्र है, ज्यादा विविधता वाला है। वह हमारे प्रति मित्रवत नहीं होकर भी एक महत्वपूर्ण पड़ोसी है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)