प्रियदर्शन का कॉलम:चुनाव लड़ना ज्यादा जरूरी है या देश में कोई बदलाव लाना?
क्या सीजेपी को अब एक राजनीतिक दल बन जाना चाहिए? इसके पक्ष में कई तर्क दिए जा रहे हैं। उसके साथ युवाओं का व्यापक समर्थन और लगाव दिख रहा है। वह प्रतिरोध की नई भाषा के लिए जानी जा रही है। यही नहीं, मौजूदा पीढ़ी का जिस व्यवस्था से मोहभंग है, उसके दायरे में पुराने दल भी शामिल हैं। फिर लोकतंत्र में किसी जन-संगठन को वास्तविक और वैध राजनीति से क्यों परहेज होना चाहिए? अंततः सारे बदलाव राजनीति से ही संचालित होते हैं। सतह पर ये तर्क सही दिखते हैं। लेकिन इनके प्रतितर्क भी हैं। अण्णा आंदोलन के बाद आम आदमी पार्टी लगभग इन्हीं तर्कों के साथ गठित की गई थी। जल्द ही वह अपनी क्रांतिकारी ऊर्जा गंवाकर राजनीति की यथास्थितिवादी धारा में शामिल हो गई। यानी जैसे ही आप राजनीति में उतरते हैं, आपको कई मजबूरियां घेर लेती हैं। चुनाव लड़ने के लिए धन चाहिए- तो आप पूंजीपतियों के प्रति नरम हो उठते हैं। वोट पाने के लिए लोकप्रिय नारे गढ़ने होते हैं तो अप्रचलित विचारों या क्रांतिकारी धारणाओं से आप परहेज करने लगते हैं। धीरे-धीरे आप समझौतापरस्त हो उठते हैं और आपकी सारी लड़ाई चुनाव जीतने और सरकार बनाने तक सीमित रह जाती है। आप कहीं जातिवाद का संरक्षण करते हैं तो कहीं सांप्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं। लेकिन अण्णा आंदोलन से निकली आप हो या जंतर-मंतर से निकली सीजेपी- वह अगर चुनाव नहीं लड़ेगी तो क्या होगा? अण्णा आंदोलन से आक्रोश की जो ऊर्जा फूटी, उसने राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को प्रक्षेपित कर दिया। अगर आप गठित न हुई होती तो दिल्ली भी शायद उन्हीं दिनों बीजेपी की हो चुकी होती। मगर फिर वही प्रश्न है- सरकार बनाना महत्वपूर्ण है या बदलाव की बयार बनाना? लोकतंत्र को सिर्फ राजनीतिक दलों ही नहीं, ऐसे सामाजिक संगठनों, ऐसे दबाव-समूहों की जरूरत भी पड़ती है, जो राजनीति की धारा मोड़ सकें, राजनीतिक दलों को मजबूर कर सकें कि वे उसके सुझाए मुद्दों की बात करें। यह जंतर-मंतर और झारखंड के मूलतः गैर-राजनीतिक आंदोलनों का ही असर है कि शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षा और नियुक्तियों का जो भ्रष्टाचार दशकों से चला आ रहा था, वह अचानक एक ज्वलंत मुद्दा बन गया। इसी तरह अचानक सभी राजनीतिक दलों को एहसास हुआ कि जेन-जी और जेन-अल्फा से जुड़ना, उनसे संवाद करना जरूरी है। देश को वैकल्पिक राजनीति की जरूरत है। लेकिन इस वैकल्पिक राजनीति के नाम पर जो दल बने, वे खुद लोकतंत्र पर बोझ ही बने। इन दिनों चिंताजनक बात यह भी है कि लोकतंत्र बिल्कुल चुनावी जीत का, संसदीय बहुमत का पर्याय बना दिया गया है, जबकि किसी भी आदर्श और स्वस्थ लोकतंत्र में बहुत सारी संवैधानिक और सामाजिक संस्थाओं की जरूरत पड़ती है। हमारे यहां भी ऐसी संस्थाएं हैं, लेकिन जैसे वे अपनी तेजस्विता, अपनी धार और संसदीय राजनीति के आगे अपनी प्रतिरोध-क्षमता खो रही हैं। बाकी सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन बिल्कुल अप्रासंगिक बन गए हैं। न लेखकों की आवाज बची है न दूसरे अनुशासनों से जुड़े बुद्धिजीवियों की। इनकी भरपाई किसी अहम मुद्दे पर फिल्मी सितारों या क्रिकेटरों की राय लेकर कर ली जाती है। तो एक बहुत बड़ा बौद्धिक शून्य है, जिसे भरे जाने के लिए राजनीतिक कम, गैर-राजनीतिक प्रयत्न ज्यादा जरूरी हैं। अच्छी बात यह है कि अभिजीत दिपके ने कहा है कि वे सीजेपी को दबाव-समूह ही बनाए रखना चाहते हैं- लेकिन इसे फिर अपना सामाजिक-बौद्धिक विस्तार भी करना होगा, तभी वह सार्थक और वास्तविक विकल्प की राह बना पाएगा- राजनीतिक दलों को मजबूर कर सकेगा कि वे जरूरी मुद्दे उठाएं और सही दिशा में बढ़ें। लोकतंत्र को सिर्फ राजनीतिक दलों ही नहीं, ऐसे सामाजिक संगठनों, ऐसे प्रेशर-ग्रुप्स की जरूरत भी पड़ती है, जो राजनीति की धारा मोड़ सकें और राजनीतिक दलों को मजबूर कर सकें कि वे उसके सुझाए मुद्दों पर बात करें। (ये लेखक के अपने विचार हैं)