मेघना पंत का कॉलम:लड़कियों को पूछना होगा, मेरा विवाह कैसे परिवार में हो रहा है
सत्ता का सबसे खतरनाक दुरुपयोग तब नहीं होता जब अपराधी व्यवस्था का फायदा उठाते हैं, बल्कि तब होता है जब व्यवस्था से जुड़े लोग यह सीख जाते हैं कि सिस्टम को कैसे अपने पक्ष में इस्तेमाल किया जा सकता है। यही बात आम महिलाओं के लिए ट्विशा शर्मा जैसे मामलों को इतना बेचैन करने वाला बना देती है। अब यह महज एक केस, एक परिवार या अदालत की लड़ाई मात्र नहीं रह गया। यह बड़ी और असहज कर देने वाली इस सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है कि जो लोग लीगल सिस्टम को बहुत अच्छे-से जानते हैं, क्या वे ही कभी-कभार इसे हथियार के तौर पर इस्तेमाल भी कर सकते हैं? भारत ने महिलाओं के लिए मजबूत कानूनी सुरक्षा के लिए दशकों तक जंग लड़ी है और ये सुरक्षा जरूरी भी थी। पीढ़ियों तक महिलाओं को चुप कराया गया, नजरअंदाज किया गया, भ्रमित किया गया, आर्थिक बंदिशों में रखा गया और सामाजिक तौर पर शर्मिंदा किया गया। लेकिन इसी दौरान कहीं न कहीं एक दूसरा डर भी धीरे-धीरे जनमानस में घर कर गया- वो यह कि कानून-व्यवस्था भी महिलाओं पर दबाव बनाने, उन्हें डराने, नैरेटिव को नियंत्रित करने और उनकी प्रतिष्ठा धूमिल करने का औजार बन सकती है। ट्विशा शर्मा केस हमें ऐसे कठिन सवालों का सामना करने को बाध्य करता है। क्या होता है जब गिरिबाला सिंह और समर्थ सिंह जैसे आरोपी कानून से अनजान सामान्य व्यक्ति नहीं होते, बल्कि कनेक्टेड, कानून की गहरी समझ या संस्थागत नेटवर्क रखने वाले लोग होते हैं? क्या होता है जब अग्रिम जमानत जल्दी मंजूर हो जाती है, नैरेटिव तेजी से फैलने लगते हैं और लड़ाई अदालत से निकलकर सामाजिक दबाव, कानाफूसी, सिलेक्टिव लीक्स, सबूतों से छेड़छाड़ और सार्वजनिक चरित्र-हनन तक पहुंचती दिखती है? मुद्दा यह नहीं है कि किसी को कानूनन अपना बचाव करने का अधिकार है या नहीं। असल सवाल है कि क्या प्रभाव, व्यवस्था की जानकारी और प्रक्रियागत बढ़त उन महिलाओं के लिए भयावह असंतुलन पैदा कर सकता है, जो पहले ही ट्रॉमा, डर, सामाजिक कलंक और भावनात्मक थकान से जूझ रही हैं। मैं यह महज एक टिप्पणीकार के तौर पर नहीं लिख रही हूं, बल्कि मैं खुद भी ऐसी ही परेशानी भरी स्थिति से गुजर चुकी हूं। मैंने महसूस किया है कि कैसा लगता है जब कोई लीगली-कनेक्टेड आरोपी अग्रिम जमानत पा लेता है। या फिर जब कोई कथित तौर पर अपनी कानूनी जानकारी और पहुंच का इस्तेमाल कर व्यवस्थित तरीके से प्रतिष्ठा नष्ट करने का प्रयास करता है। जो लोग कानून की खामी, देरी, सुरक्षा और उसकी चुप्पी का बखूबी फायदा उठाना जानते हैं, वही जब इसे हथियार बनाते हैं तो आपको समझ आता है कि लड़ाई कितनी असमानता भरी हो सकती है। ज्यादातर महिलाओं के लिए अदालतों का माहौल पहले ही डराने वाला होता है। उस पर ताकतवर लोगों का नेटवर्क, प्रभाव, सामाजिक हैसियत, कानून की जानकारी और नैरेटिव-मैनिपुलेशन भी मिल जाए तो पूरी प्रक्रिया ही सजा जैसी प्रतीत होती है। सजा सिर्फ कानूनी नहीं रह जाती, बल्कि मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और बेहद व्यक्तिगत बन जाती है। ऐसी स्थितियों को और खतरनाक बनाने वाली चीजें अकसर अदृश्य तरीके से सामने आती हैं। इनमें कागज पर तो कोई बड़ा उल्लंघन नहीं दिखता, लेकिन पैटर्न जरूर नजर आते हैं- सोचा-समझा विलम्ब, प्रतिष्ठा को लेकर कानाफूसी, प्रक्रियाओं के माध्यम से डराना, हताश करना और प्रभाव का इस्तेमाल करना। धीरे-धीरे महिला को लगता है कि वह महज अपनी पैरवी नहीं कर रही, अपनी मानसिक स्थिति, विश्वसनीयता, मातृत्व, चरित्र, अपने अस्तित्व तक को बचा रही है। ट्विशा शर्मा का मामला इसीलिए मायने रखता है, क्योंकि यह देश में बढ़ती एक चिंता को सामने लाता है। यह चिंता अपराध या आरोपों को लेकर नहीं, बल्कि कानून के सामने असमानता को लेकर भी है। इस प्रकरण का सबसे त्रासद पहलू यह है कि आज की युवा महिलाएं अब केवल अपने होने वाले पति के बारे में यही नहीं पूछतीं कि क्या वह एक अच्छा इंसान है? इसके साथ वे यह भी पूछ रही हैं मैं किस प्रकार के परिवार में विवाह करने जा रही हूं? क्या वहां मेरी सुरक्षा होगी? और यदि कुछ गलत हो गया, तो समाज आखिर किस पर विश्वास करेगा? जिन लोगों के पास कानून का ज्ञान और संस्थागत पहुंच है, उनकी जिम्मेदारी और अधिक होती है। अगर लोगों को यह लगने लगे कि सिस्टम प्रभावशाली लोगों से अलग और आमजन से अलग तरह का व्यवहार करता है तो उसी पल न्याय पर भरोसा कमजोर होने लगता है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)