रीटा कोठारी का कॉलम:हमारी घरेलू बातचीत में किस सीमा तक फलसफे समाए हैं?
मेरे मायके की शब्दावली सत्संग से आती है। जब किसी की मृत्यु होती है तो हमारे यहां कहा जाता है- ‘उनका शरीर शांत हो गया है।’ जिस सिंधी कौम ने बंटवारे के दुःख देखे हों, तरह-तरह के व्यापारों में हाथ डालकर कभी कामयाबी तो कभी बेहद नुकसान उठाए हों, वह मृत्यु और बीमारियों से जल्दी घबराती नहीं है। मुझे याद है पिताजी मां से कहते थे- ‘मेरे कपड़े फट गए हैं, कितनी जगहों से उन्हें सी पाऊंगा?’ दरअसल वे अपने शरीर के बारे में बात कर रहे होते थे। मैंने मां-पिता को एक-दूसरे से कहते सुना था कि हममें से पहले किस का ‘स्टेशन’ आएगा? यानी जिंदगी की ट्रेन से पहले कौन उतर जाएगा? क्या यह मौत की स्वीकृति और एक फिलॉस्फी है? अगर मैं इसकी तुलना अपने गुजराती ससुराल से करूं तो कहानी अलग ही बनती है। यहां ‘क्वालिटी ऑफ लाइफ’ पर जोर देकर शरीर को सम्भाला जाता है, मृत्यु हो जाने पर भी यादें संजोई जाती हैं। एक परिवार इतिहास के उतार-चढ़ाव से गुजरा है, दूसरे ने पढ़ाई और आधुनिकता को थामा हुआ है। मुझे लगता है इन दोनों के बीच मैं दो घर नहीं, दो अलग देशों का अनुभव करती हूं। और उनके फर्क मृत्यु को लेकर उनके नजरिये में सबसे ज्यादा जाहिर होते हैं। जबकि कहा जाता है कि मृत्यु सब के लिए समान है। मेरी स्मृति में सबसे पहले जॉन डन की जानी-मानी पंक्तियां उभरती हैं- ‘डेथ, बी नॉट प्राउड, दो सम हैव कॉल्ड दी माइटी एंड ड्रेडफुल, फॉर दाउ आर्ट नॉट सो।’ यहां पर कवि मृत्यु से कह रहा है कि तुम्हें इस बात का गुमान है कि तुम हमें खत्म कर देती हो, किंतु हम तो एक लम्बी नींद सो जाते हैं और कहीं और नई दुनिया बसाते हैं। मृत्यु, तुम ये अभिमान न करो कि तुम बलवान हो। मृत्यु को अपना कर्तव्य निभाना पड़ता है और हर किसी की सेवा में कभी न कभी आना पड़ता है। जब यह कविता स्कूल में पढ़ी थी, तब मृत्यु के बारे में विचार करने की न तो जरूरत थी, न क्षमता। किंतु अब यह कविता याद आने लगी है। क्या यह अभयदान की बात करती है? क्या यही चीज मेरे मां-पिता अपने ढंग से समझे थे? क्या मृत्यु का खौफ न रखकर जीना मुमकिन है? यह सवाल अब कई बार आता है। मुझे लगता है कि अपनी मृत्यु के विचार से तो मैंने खौफ नहीं महसूस किया। किंतु अपने निकट के दोस्त और परिवार वालों की मृत्यु का साक्षी होना डरावना विचार है। अपने को विषाद के समंदर में पाना खौफनाक ख्याल है। उस विचार को हम कैसे छोटा बनाएं? क्या यह कहना कि ‘शरीर शांत हो गया’- हमें आत्मा के अमर होने की तसल्ली दे देगा? क्या अपनों की तरफ विरक्ति होने से यह दुःख सहनीय बन जाएगा? इन सभी सवालों को लेकर मैं साहित्य में मृत्यु की कल्पना ढूंढने लगी। मुझे साहित्य जीवन की गहराइयों का सबसे श्रेष्ठ प्रतिबिम्ब मालूम होता है। बहरहाल, इस सफर का एक खास किस्सा आपको सुनना चाहती हूं। अगर मौका मिला तो कुछ और अगली बार। गुजरात की जानी-मानी और वरिष्ठ लेखिका धीरूबेन पटेल की यह कहानी है, जिसका शीर्षक ‘अंगत अनुभव’ है। रसिकभाई खूब बातूनी कर्मचारी हैं और मनहूस खबरें सुनाने में माहिर। जब वे दफ्तर में अपनी कुर्सी पर बैठते हैं तो बाकी के लोग आसपास नहीं फटकते। अगर रसिकभाई से पूछा जाए उन्हें चाय चाहिए तो चाय का पुराण शुरू होता है कि अरे चाय तो तुम मेहसाणा की पियो, वो जो गाय है वैसा दूध आजकल कहां? इस तरह बात चाय से दूध और दूध से गाय और भैंस पर जाकर जाने कहां चली जाती है। अगर रोटियों की बात निकले तो रसिकभाई सुनाने लगते कि आजकल के नौकर कितनी रोटी खाते हैं और वे कितनी खाते हैं और किस तरह के आटे से मुलायम रोटी बनती है और कहां का गेहूं अच्छा है वगैरह-वगैरह। एक बार दफ्तर के लोगों को पता चलता है कि रसिकभाई का जवान बेटा अकस्मात चल बसा। कुछ दिन बाद रसिकभाई जब दफ्तर लौटे तो लोगों को लगा कि अब तो वे कितना ही बोलेंगे। उन्हें कितना बोलने की आदत जो थी। किंतु रसिकभाई चुप। जो सवाल पूछा जाए उनके जवाब सिर्फ हां या ना में। वे शब्दों के जंगल से निकल गए थे! यह है मृत्यु का सबसे जटिल रंग। अपने होते अपने बच्चे को खो देना। तब मृत्यु आपके जीवन के बीचोबीच आ बसती है! मुझे याद है पिताजी मां से कहते थे- ‘मेरे कपड़े फट गए हैं, कितनी जगहों से उन्हें सी पाऊंगा?’ दरअसल वे अपने शरीर के बारे में बात कर रहे होते थे। मैंने मां-पिता को एक-दूसरे से कहते सुना था कि हममें से पहले किस का ‘स्टेशन’ आएगा?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)