रीता राममूर्ति का कॉलम:बचपन से ही पढ़ने की आदत डालें तो जीवन बदल जाता है
अधिकांश पैरेंट्स बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि इसकी शुरुआत कैसे करें। वे स्क्रीन के खिलाफ लड़ाई भी हार जाते हैं। यह दोहरी मार है! आज नेशनल रीडिंग डे के मौके पर, आइए इससे निपटने के तरीके जानते हैं। हर पैरेंट को यह जानना चाहिए कि बच्चे का स्वस्थ विकास स्लो-डोपामिन पर निर्भर करता है। बच्चा एक लक्ष्य तय करता है, उसके लिए संघर्ष करता है, उसमें नाकाम होता है लेकिन प्रयास जारी रखता है और अंतत: सफल होता है। इससे मिलने वाला न्यूरोकेमिकल रिवॉर्ड हताशा सहने की क्षमता और काम करने की प्रेरणा रचता है। टचस्क्रीन डिवाइस इसके बिल्कुल विपरीत करती हैं : हर 8 सेकंड में फास्ट-डोपामिन का चक्र। ऐसे में स्क्रीन पर पले-बढ़े बच्चे लंबे समय तक प्रयास जारी रखने के लिए जरूरी मस्तिष्क की संरचनाओं को विकसित नहीं कर पाते। इसका खामियाजा 2 से 9 वर्ष की उम्र के महत्वपूर्ण चरण में प्रीफ्रंटल डेवलपमेंट में मापी जा सकने वाली कमी के रूप में दिखाई देता है। खेल, बातचीत की क्षमताएं और बच्चे में रीडिंग की आदत विकसित करने जैसी गतिविधियों के माध्यम से इसे बदलने का अवसर जन्म से ही शुरू हो जाता है। जन्म से 3 वर्ष तक की उम्र के लिए : जब आप किसी शिशु को जोर से पढ़कर कुछ सुनाते हैं, तो आपकी आवाज की लय और उसका उतार-चढ़ाव बच्चे के न्यूरल मूवमेंट्स के साथ तालमेल बिठाने लगते हैं। इसे एंट्रेनमेंट कहते हैं। वैज्ञानिक शोधों में पाया गया है कि किसी शिशु से धीमी और लयबद्ध शैली में की जाने वाली बातचीत सात महीने तक के बच्चों में स्पीच की कॉर्टिकल ट्रैकिंग को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाती है। उनका मस्तिष्क आपकी आवाज से तालमेल बैठा रहा होता है और उसी से भाषा की संरचना सीखता है। ऐसे में बच्चे के जन्म के बाद पहले कुछ हफ्तों से ही रोज पढ़ें। ऐसी किताबें चुनें जिनमें स्पष्ट लय और दोहराव हो (बाल कविताएं, दोहराए जाने वाले अंशों वाली सरल कहानियां)। गति धीमी रखें। भाव-भंगिमा को उभारें। याद रखें कि शब्दों से ज्यादा यह मायने रखता है कि आप उन्हें ‘कैसे’ पढ़ते हैं। अभी आप बच्चे को शब्दावली नहीं सिखा रहे हैं; उसके मस्तिष्क को ध्वनि के पैटर्न को समझने की क्षमता के लिए तैयार कर रहे हैं- इसी से पढ़ने की क्षमता विकसित होती है। 3 से 6 वर्ष तक की उम्र के लिए : जैसे-जैसे बच्चे स्कूल जाने की उम्र के करीब पहुंचते हैं, सोने से पहले कुछ पढ़कर सुनाना माता-पिता द्वारा किए जा सकने वाले सबसे प्रभावशाली कार्यों में से एक बन जाता है। जब शरीर नींद की ओर बढ़ता है, तो मस्तिष्क थीटा तरंगों की अवस्था में प्रवेश करता है। ये कल्पना, भावनात्मक स्मृति और रचनात्मक जुड़ाव से जुड़ी होती हैं। नींद की दहलीज पर आत्मसात की गई कहानियां स्मृति में दर्ज होने की अधिक संभावना रखती हैं। सोने से पहले सुनाई जाने वाली कहानी केवल भावनात्मक जुड़ाव नहीं है। यह एक रणनीति है। पैरेंट्स सोने से पहले पढ़ने की आदत को अनिवार्य बनाएं। गर्मजोशी और बिना जल्दबाजी के धीमी गति से पढ़ें। ऐसी कहानियां चुनें, जिनमें भावनात्मक जटिलता हो। ऐसे पात्र जो दुविधाओं का सामना करते हैं, डर महसूस करते हैं, आश्चर्य का अनुभव करते हैं। बच्चे को सवाल पूछने दें और कहानी में ठहरने दें। यही वह समय होता है जब मस्तिष्क सबसे अधिक ग्रहणशील होता है। 6 से 10 वर्ष तक की उम्र के लिए : जब कोई बच्चा किसी पन्ने पर लिखे शब्दों को सक्रिय रूप से समझकर पढ़ता है, तो उसके मस्तिष्क में बीटा तरंगों का प्रभुत्व होता है। ये एकाग्र सोच, निर्णय लेने और सक्रियतापूर्वक सीखने से जुड़ी होती हैं। 2024 के एक ईईजी अध्ययन में पाया गया कि अच्छे पाठकों में बीटा प्रणाली बेहतर ढंग से वायर्ड होती है। 6 से 8 वर्ष की आयु के बच्चों में स्क्रीन पर पढ़ने की तुलना में छपी हुई किताबें पढ़ना बीटा और गामा शक्ति को अधिक सक्रिय करता है। जो बच्चा वयस्क होने तक नियमित पाठक बन जाता है, उसका मस्तिष्क अधिक गहराई से एकाग्र होता है, स्मृतियों को अधिक कुशलता से दर्ज करता है, अधिक सहजता से अंतर्दृष्टियां उत्पन्न करता है और ऐसी दुनिया में ध्यान बनाए रखता है जिसे ध्यान भटकाने के लिए ही बनाया गया है। यह कोई छोटा लाभ नहीं, एक बुनियादी एडवांटेज है। जो बच्चा वयस्क होने तक नियमित पाठक बन जाता है, उसका मस्तिष्क अधिक एकाग्र होता है, स्मृतियों को अधिक कुशलता से दर्ज करता है, अंतर्दृष्टियां उत्पन्न करता है और ऐसी दुनिया में ध्यान बनाए रखता है जिसे ध्यान भटकाने के लिए ही रचा गया है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)