विराग गुप्ता का कॉलम:एक ओर लम्बित मुकदमे हैं तो दूसरी तरफ गैरजरूरी जिरहें
जजों के फैसलों में विरोधाभासों और विलम्ब से देश के लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। आज लगभग 4.88 करोड़ मुकदमे जिला अदालतों में लम्बित हैं, फिर भी वहां जजों के 4721 खाली पदों पर भर्ती नहीं हो रही। सभी हाईकोर्ट में भी 63.98 लाख मुकदमे लम्बित हैं, वहां भी जजों के 325 पद खाली हैं। सुप्रीम कोर्ट की बात करें तो वहां साल 2015 से 2019 तक लगभग 60 हजार मामले लम्बित थे। उसके बाद जल्द मामले निपटाने का शोर बढ़ने के साथ ही लम्बित मामलों की संख्या भी बढ़कर अब 93 हजार से ज्यादा हो गई है। अब जिला और हाईकोर्ट में जजों के खाली पदों पर भर्ती करने के बजाय सुप्रीम कोर्ट में 4 जजों को बढ़ाने के लिए कानून में संशोधन हो रहा है। क्या सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ने से लोगों को जल्द न्याय मिलेगा? इससे जुड़े 4 पहलुओं को समझने की जरूरत है। 1. संविधान के अनुसार अधिकांश मामलों में आखिरी फैसले के लिए हाईकोर्ट ही सर्वोच्च अदालत है। लेकिन रसूखदार पक्षकारों और बड़े वकीलों के मामलों में धीरे-धीरे सुप्रीम कोर्ट से ही फैसले होने लगे। इससे वीआईपी जस्टिस और मुकदमेबाजी का मर्ज बढ़ने के साथ विरोधाभासी फैसलों की बाढ़ आ गई। सबरीमाला मामले में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि 2006 में दायर याचिका को उसी समय कचरे के डब्बे में डाल दिया जाता तो न्यायिक विवाद नहीं बढ़ता। जजों के अनुसार धार्मिक मामलों पर न्यायपालिका को लक्ष्मण-रेखा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। सीमित बिंदुओं पर मामले को जल्द निपटाने के बजाय लम्बी-चौड़ी अकादमिक बहसें चल रही हैं। इससे हजारों अन्य मामलों की सुनवाई टल रही है और मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। 2. संविधान लागू होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के सभी आठ जज एक साथ बैठकर चुनिंदा मुकदमों में संवैधानिक मुद्दों का निर्धारण करते थे। मुकदमों की संख्या बढ़ने के साथ डिवीजन बेंच के गठन की शुरुआत हुई। रघुवीर सिंह मामले में 1989 के फैसले के अनुसार दो या तीन जजों की बेंच सहूलियत के अनुसार बनाई जा सकती है। अदालती कार्रवाई के सीधे प्रसारण में लोग देख रहे हैं कि अधिकांश मामलों में परस्पर परामर्श के बगैर ही सीनियर जज आदेश लिखवा देते हैं। इससे कई सवाल खड़े होते हैं। मसलन, क्या जजों ने पहले से ही निर्णय पर सहमति बना ली थी? यदि ऐसा है तो फिर वकीलों की बहस का क्या मतलब है? यदि जूनियर जज के साथ परामर्श नहीं हुआ तो पीठ में उनके साथ बैठने की क्या आवश्यकता है? अगर दो जजों की पीठ में दूसरे जज सहमत नहीं हुए तो मामले को तीन जजों की बेंच के पास भेजा जाएगा। इसलिए दो के बजाय तीन जजों की बेंच के गठन से जजों की योग्यता और अनुभव के बेहतर लाभ लेने की जरूरत है। 3. पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट मामले में जिला अदालतों के जजों ने एक महीने में लाखों विवादों का निपटारा कर दिया था। जिला जज की रैंक के लोग रजिस्ट्रार बनते हैं, जिन्हें जिला अदालत में फांसी देने तक का अधिकार होता है। सुप्रीम कोर्ट नियमों के अनुसार रजिस्ट्रार को मूल दस्तावेज, अनूदित प्रति, कोर्ट फीस मामलों में छूट की अर्जी, मुकदमों की लिस्टिंग और रूटीन अर्जियों के निपटारे के लिए न्यायिक आदेश पारित करने का अधिकार मिलना चाहिए। इससे जूनियर वकीलों को पैरवी का अवसर मिलने के साथ ही जजों को भी मुख्य मामले की सुनवाई के लिए ज्यादा समय मिलेगा। 4. सुप्रीम कोर्ट के नियमों में 2020 में हुए बदलाव के अनुसार जमानत, मुकदमों के ट्रांसफर जैसे मामलों को एक जज की बेंच सुन सकती है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के पहले अधिकांश जज हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर सर्वशक्तिशाली होते हैं। सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर अगर हाईकोर्ट में जजों की रिटायरमेंट उम्र 65 साल हो जाए तो शायद ही कोई चीफ जस्टिस सुप्रीम कोर्ट में जूनियर जज के तौर पर प्रमोट होना पसंद करेंगे।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट के नियमों के अनुसार अधिकांश मुकदमों की सुनवाई एक जज द्वारा की जा सकती है। इससे जजों की संख्या बढ़ाए बगैर ही लम्बित मुकदमों का बोझ कम हो सकता है। संविधान के अनुसार अधिकांश मामलों में आखिरी फैसले के लिए हाईकोर्ट ही सर्वोच्च अदालत है। लेकिन लम्बी-चौड़ी अकादमिक बहसें चल रही हैं। इससे हजारों मामलों की सुनवाई टल रही है और मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)