शिव्या नाथ का कॉलम:कोई भी तकनीक हमसे जीने की अनुभूति नहीं छीन सकती

Jun 13, 2026 - 06:08
शिव्या नाथ का कॉलम:कोई भी तकनीक हमसे जीने की अनुभूति नहीं छीन सकती
मुम्बई की कई और शामों जैसी ही वह एक शाम थी। मैं मरीन ड्राइव की सी-वॉल पर बैठी थी और मेरे हेडफ़ोन में लियोनार्ड कोहेन का गीत ‘फेमस ब्लू रेनकोट’ बज रहा था। हवा ने मेरे बालों को बिखेर दिया था और डूबते सूरज की लालिमा मेरी आंखों में समा गई थी। जैसे ही आग का गोला अरब सागर में उतरा, लहरों की तुमुल-ध्वनि कोहेन की गहरी, सम्मोहक आवाज के साथ मिलकर उस जादुई क्षण को पूर्णता देने लगी। मेरे मन में दूसरे अविस्मरणीय सूर्यास्तों की स्मृतियां उमड़ पड़ीं : क्यूबा के मालेकॉन में, बाली के एक सक्रिय ज्वालामुखी पर और युगांडा के सबसे बड़े राष्ट्रीय उद्यान में सेल्फ-ड्राइव सफारी के दौरान। फिर मेरा ध्यान भटक गया और मैंने अपना ईमेल खोल लिया। एक नया मेल आया था, जो ऊष्मा और सामंजस्य से भरा हुआ था। लेकिन उसके अंत में लिखा था : ‘क्या आप इसका थोड़ा और कैजुअल टोन वाला संस्करण चाहेंगी, या फिर ऐसा जिसे आपके मैनेजर के साथ निजी बातचीत के लिए तैयार किया गया हो?’ बीते कुछ महीनों में मुझे अकसर अपनी लिखने और कम्युनिकेट करने की क्षमता पर संशय हुआ। लेकिन बाद में मुझे एहसास हुआ कि जिन ईमेल और सोशल मीडिया पोस्टों को देखकर मैं प्रभावित हुई थी, वे वास्तव में इंसानों ने लिखे ही नहीं थे। जब मुझे एआई द्वारा लिखे ईमेल मिलते हैं, जब मैं टीम के सदस्यों को काम के लिए इसका उपयोग करते देखती हूं, जब मैं चैटजीपीटी द्वारा लिखी लिंक्डइन पोस्ट और वॉट्सएप मैसेज पढ़ती हूं तो समझ नहीं आता क्या प्रतिक्रिया दूं। क्या मुझे अपना समय और ऊर्जा उन एआई द्वारा लिखे गए ईमेल और संदेशों का जवाब देने में लगानी चाहिए? क्या मुझे भी चैटजीपीटी का उपयोग करके जवाब देना चाहिए, जिससे ऐसी विद्रूपतापूर्ण स्थिति पैदा हो जाए, जहां एक मशीन दूसरी मशीन से यह दिखावा करते हुए बात कर रही हो कि वह इंसान है? मैं ऐसे आभासी संबंध कैसे बना सकती हूं, जो वास्तविक इंसानों नहीं, एआई द्वारा तैयार किए उत्तरों पर आधारित हों? मैं क्लॉड द्वारा रची जा रही ब्लॉग पोस्टों और न्यूजलेटर्स से कैसे प्रतिस्पर्धा करूं? जब पर्प्लेक्सिटी से बनी किताबें बुकस्टोर्स में छा जाएंगी, तब क्या होगा? 2024 में ऑक्सफोर्ड ने ‘ब्रेन रॉट’ को वर्ड ऑफ द ईयर चुना था। इसका अर्थ है- सोशल मीडिया पर कम गुणवत्ता और निम्नतर मूल्य वाली सामग्री का अत्यधिक उपभोग करने से हमारे मस्तिष्क का क्षरण। अब इसमें एआई को भी जोड़ दें तो ब्रेन रॉट कई गुना बढ़ जाता है। मुझे पता है कि तकनीक को नजरअंदाज करने और दुनिया से पीछे रह जाने का क्या परिणाम होता है। जब मैं डिजिटल स्टोरीटेलर के रूप में शुरुआत कर रही थी, तब मैंने पारंपरिक मीडिया के अपने मित्रों के साथ ऐसा होते देखा था। लेकिन एआई केवल कोई नया माध्यम या उपकरण नहीं है; यह एक क्रिएटिव व्यक्ति के रूप में हमारे अस्तित्व पर ही प्रश्न उठा रहा है। मैंने अपना फोन रख दिया। समुद्र-तट के आकाश में नारंगी और गुलाबी रंगों की छटाएं फैल गई थीं। मुझे एहसास हुआ कि कोई भी तकनीक इस अकथनीय सुख को कभी पूरी तरह री-क्रिएट नहीं कर सकती- यहां बैठने का आनंद, मुंबई की नमकीन हवा को सांसों में संजोने का अनुभव, सूर्यास्त को समुद्र में उतरते हुए देखने का क्षण और एक महानगर के जन-ज्वार के बीच भी एक अजीब-सी शांतचित्तता की अनुभूति। डेढ़ महीने से अधिक समय तक मैंने स्वयं को पूरी तरह जर्मन भाषा सीखने के लिए समर्पित कर दिया था। हर दिन पांच घंटे एक नई भाषा सीखने में खुद को लगाना थकाऊ काम था, लेकिन साथ ही यह ऊर्जा से भर देने वाला भी था। मेरे मस्तिष्क में नए तंत्रिका-संबंध (सिनैप्स) बन रहे थे। हां, चैटजीपीटी तुरंत अनुवाद कर सकता है, लेकिन वह कभी भी भाषाओं में छुपे रहस्य को जानने का सुख नहीं रच सकता। मेरे छोटे-से विद्रोह का रूप एआई से दूरी बनाना नहीं, अपने ब्रेन रॉट को पहचानना था। इस वर्ष की शुरुआत में मैंने महसूस किया कि छोटे प्रारूप वाली कहानियों ने लंबे समय तक चलने वाले प्रोजेक्ट्स पर काम करने की मेरी क्षमता को प्रभावित किया था। इसलिए मैंने सचेत रूप से गहन कार्य और धीमी, टिकाऊ उत्पादकता को प्राथमिकता देना शुरू किया। उस शाम मरीन ड्राइव पर एक सम्मोहक अर्धचंद्र दिखाई दिया। मुम्बई के क्षितिज की रोशनियां जगमगाने लगीं, हवा तेज हो गई, भीड़ धीरे-धीरे छंट गई। अपनी जगह पर बैठे, उन तमाम उलझे हुए तरीकों के बारे में सोचते हुए- जिनसे हम बदलावों का सामना करते हैं- मैंने स्वयं को अपरिष्कृत, भ्रांत और अपूर्ण महसूस किया- लेकिन जीवित भी! कोई भी तकनीक इसे हमसे नहीं छीन सकती! क्या मुझे अपना समय एआई द्वारा लिखे गए ईमेल का जवाब देने में लगाना चाहिए? क्या मुझे भी चैटजीपीटी का उपयोग करके जवाब देना चाहिए, जिससे ऐसी स्थिति पैदा हो जाए, जहां एक मशीन दूसरी मशीन से यह दिखावा करते हुए बात कर रही हो कि वह इंसान है? (ये लेखिका के अपने विचार हैं)