शेखर गुप्ता का कॉलम:पाक की नियति बन चुकी है भुलावे में रहना

May 21, 2026 - 06:05
शेखर गुप्ता का कॉलम:पाक की नियति बन चुकी है भुलावे में रहना
भारत के साथ पाकिस्तान के युद्ध का इतिहास कैसा रहा है? सामरिक रूप से ठीक, लेकिन रणनीतिक रूप से नुकसानदायक। यही वजह है कि वह पूरी ताकत से शुरुआत करने के बावजूद हर युद्ध हारता है। लेकिन 1971 और कारगिल युद्ध को छोड़कर उसने ज्यादातर युद्धों में जीत का दावा किया है। गत वर्ष की 87 घंटे की मुठभेड़ को ही देख लीजिए। मुनीर से लेकर पाकिस्तान की राजनीति के सबसे निचले स्तर तक पूरा पाकिस्तान मानता है कि इस बार जीत उसकी हुई; कि इसके बाद अमेरिका ने उसे फिर गले लगाया और इसे उसकी खुद की घोषित ‘जीत’ की मंजूरी माना गया। जबकि हकीकत यह है कि पहलगाम हत्याकांड के सिर्फ चार दिन पहले और ऑपरेशन सिंदूर के करीब दो हफ्ते पहले स्टीव विटकॉफ के बेटे जाक का दौरा और क्रिप्टो सौदा हो चुका था। मुनीर को मालूम था कि भारत पहलगाम का जवाब देगा। इसलिए उन्होंने ट्रम्प परिवार के लालच का फायदा उठाने की चाल पहले ही तैयार कर ली थी। दुनिया में अधिकतर लोगों से पहले इस बात को समझने के लिए आप मुनीर की तारीफ कर सकते हैं या हो सकता है कि सऊदी अरब ने उन्हें पहले ही सावधान कर दिया हो। लड़ाई शुरू होने से पहले ही उन्होंने ट्रम्प के ‘सिस्टम’ को अपने पक्ष में कर लिया था। एक हफ्ते पहले, 16 अप्रैल 2025 को विदेश में बसे पाकिस्तानियों को दिए उनके भाषण ने इसका संकेत दे दिया था। वह हत्याकांड भारत की जवाबी कार्रवाई देखने की उनकी योजना का हिस्सा था। ट्रम्प को अपने पक्ष में लाकर कश्मीर मुद्दे को उठाना उनका रणनीतिक लक्ष्य था। पहली चाल सफल रही, लेकिन दूसरी पूरी तरह नाकाम रही। पाकिस्तान ने यह जानते हुए भारत को उकसाया था कि भारत जवाब में सैन्य कार्रवाई करेगा, इसलिए उसने यह भी अंदाजा लगाया होगा कि किन जगहों को निशाना बनाया जाएगा। वे यह भी जानते थे कि भारत कौन से हथियार इस्तेमाल करेगा। इसलिए भारतीय वायुसेना ने 7 मई की रात 1 बजकर 7 मिनट पर जब उड़ान भरी, तब वे तैयार थे। अपने अंदरूनी इलाकों में निशानों पर हमलों को वे रोक नहीं पाए, लेकिन यह उनका मकसद भी नहीं था। वे जवाब को हवाई मुठभेड़ तक सीमित रखना चाहते थे। एईडब्ल्यू विमानों और जे-10सी, जेएफ-17 के साथ पीएल-15 मिसाइलों को आगे रखकर इस कार्रवाई का पहले से अभ्यास किया गया था। उन्हें कुछ सफलता मिली और वे इसका जश्न मना रहे थे। भारत में उच्च स्तर पर कुछ विमानों के नुकसान की बात मानी गई है। पूर्व सीडीएस ने इसे ‘सामरिक गलती’ बताया, लेकिन आईएएफ ने हिसाब बराबर करने की योजना बनाई। सबसे पहले पाकिस्तान के एयर डिफेंस को दबाव में लाने के लिए एंटी-रेडिएशन ड्रोनों से हमला किया गया। और आखिर में पीएएफ के सबसे सुरक्षित हवाई अड्डों पर लगातार हवाई हमले किए गए। पीएएफ का कोई भी विमान, या कितनी भी दूरी तक मार करने वाली मिसाइल क्यों न हो, जवाब देने के लिए उड़ान नहीं भर सकी। जब तक पाकिस्तान ने संघर्षविराम की मांग की, तब तक सिर्फ एक पक्ष के पास सबूत थे कि दूसरे पक्ष को कितना नुकसान हुआ है : व्यावसायिक उपग्रहों से मिली तस्वीरें बता रही थीं कि पीएएफ के कम-से-कम 13 हवाई अड्डे और तीन रडार नष्ट हो चुके थे। इसके बावजूद पाकिस्तान अपनी जीत का जश्न मना रहा है। एक भारतीय कमांडर ने कहा यह ऐसा ही था, जैसे भारत ने पाकिस्तान को हॉकी मैच में 3-1 से हरा दिया हो। बात इतनी थी कि उनके सेंटर फॉरवर्ड ने गोल किया और हमारे खिलाड़ियों ने तीन पेनल्टी को गोल में बदल दिया। हमें नुकसान पहुंचाने के उनके दावों का कोई सबूत नहीं है। भारत के सभी हवाई अड्डों के पास शहर बसे हुए हैं, कुछ भी छिपा नहीं है, लेकिन कोई उपग्रह तस्वीर सामने नहीं आई है। पाकिस्तान के सभी दावे बेकार हैं। बहरहाल, यहां मैं हाल के इतिहास को दोहराने की कोशिश नहीं कर रहा हूं, बल्कि अपनी मुख्य बात पर जोर दे रहा हूं। वह यह है कि पाकिस्तानी फौजी दिमाग अच्छी तरह सोचता है, लेकिन सिर्फ सामरिक चालों के हिसाब से सोचता है। वह यह अंदाजा नहीं लगा पाता कि भारत किस तरह जवाब देगा। यह अंदरूनी कमजोरी, भारतीय सेना के प्रति अनादर या दोनों का मेल हो सकता है। यह विचार भी हमें पाकिस्तानी लेखक शुजा नवाज की किताब क्रॉस्ड सोर्ड्स से मिला है। कारगिल युद्ध की बात करते हुए उन्होंने लिखा है कि भारत के साथ ‘वार गेम’ खेल रही पाकिस्तानी टीम ने बिल्कुल सही अनुमान लगाया था कि वाजपेयी सरकार किस तरह जवाब देगी। अगर उसे गंभीरता से लिया जाता, तो पाकिस्तान हार, पीछे हटने और बेइज्जती से बच सकता था, लेकिन उसका मजाक उड़ाया गया। सामरिक दृष्टि से कारगिल युद्ध शानदार था। धोखा, योजना, गोपनीयता, इलाके का चुनाव और जगह का महत्व, हर लिहाज से शानदार। लेकिन किसी ने यह नहीं सोचा कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो…, भारत ने अगर मुकाबला किया तो? इसके लिए रणनीतिक सोच चाहिए, जिसकी पाकिस्तान में कमी है। कारगिल इसलिए रणनीतिक हार साबित हुई, क्योंकि इसने नियंत्रण रेखा की वैश्विक मान्यता को मजबूत कर दिया। इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर थोड़ी देर रुकते हुए बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान को कैमरे पर कहा था कि इस उपमहाद्वीप के नक्शे पर खींची गई सीमाओं को अब खून से नहीं बदला जा सकता। यह कहानी पहले भी पुरानी लड़ाइयों में दोहराई जा चुकी है। 1965 में छंब पर कब्जा करने के लिए ऑपरेशन जिब्राल्टर और इसके बाद अखनूर पर कब्जा करने के लिए ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम चलाया गया, ताकि कश्मीर को भारत से काट दिया जाए। पाकिस्तानी सेना ने यह सोच लिया कि भारत कश्मीर छोड़ देगा और भारत की संभावित जवाबी कार्रवाई पर ठीक से विचार नहीं किया गया। उसी युद्ध में खेमकरण में टैंकों से किया गया अप्रत्याशित हमला इस उपमहाद्वीप के सबसे साहसी हमलों में गिना जाता है। उस युद्ध की सबसे बड़ी लड़ाई पाकिस्तान की हार और उसके बेहतरीन टैंकों के नष्ट होने की थी। पाकिस्तान ने उस युद्ध में भी अपनी जीत का दावा किया था, लेकिन विडंबना यह है कि वह 6 सितंबर को ‘डिफेंस ऑफ पाकिस्तान डे’ के रूप में मनाता है! इतिहास का सबक है... ऑपरेशन सिंदूर से पाकिस्तान ने गलत सबक लिया है। ऐसे में हमें पाकिस्तान की अगली उकसाने वाली कार्रवाई का अंदाजा पहले ही लगाना होगा। इतिहास बताता है कि जब पाकिस्तानी सत्ता ऐसी स्थिति में पहुंचती है, तब वह सबसे खराब, और खुद को ही नुकसान पहुंचाने वाले रणनीतिक फैसले करती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)