सैयद अता हसनैन का कॉलम:युद्ध में जमीनों पर कब्जे का अब पहले जैसा महत्व नहीं रहा है

Jun 18, 2026 - 06:08
सैयद अता हसनैन का कॉलम:युद्ध में जमीनों पर कब्जे का अब पहले जैसा महत्व नहीं रहा है
युद्धों की प्रकृति बदल रही है। भू-भाग पर नियंत्रण आज भी अहम है, लेकिन देश अब लंबे समय तक किसी क्षेत्र पर कब्जा बनाए रखने के बजाय अपनी पहुंच, दबाव और रसूख के जरिए वांछित रणनीतिक परिणाम हासिल करना ज्यादा पसंद करते हैं। जबकि इतिहास में सैन्य सफलता का सीधा मतलब था संबंधित इलाके पर कब्जा। सेनाएं जमीन कब्जाती थीं, राजधानियों पर नियंत्रण करती थीं और इसके जरिए राजनीतिक परिणाम थोपती थीं। रोमन संघर्षों से लेकर विश्व युद्धों तक, जमीन ही लक्ष्य भी थी और जीत का पैमाना भी। इसके पीछे सीधा-सा तर्क था कि किसी राज्य या उसकी जनता पर दबदबा बनाना है तो उसकी जमीन, संसाधनों और संस्थानों पर नियंत्रण करना होगा। भौगोलिक दूरी रणनीतिक बाधा थी, क्योंकि इसके बढ़ने से सैन्य शक्ति का प्रभाव घटता जाता था। लेकिन आज के संघर्षों में देश जमीन पर कब्जा किए बगैर रणनीतिक परिणाम हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। लंबी दूरी के सटीक हमलों, ड्रोन, साइबर ऑपरेशनों, आर्थिक दबाव, प्रॉक्सी वारफेयर और सूचना अभियानों के जरिए प्रतिद्वंद्वी दीर्घकालीन कब्जे की जिम्मेदारियों से बचते हुए भी परिणामों को तय करने की कोशिश करते हैं। उद्देश्य वही हैं, लेकिन तरीके बदल रहे हैं। इसका एक कारण है जमीन पर कब्जे से जुड़े आर्थिक नफे-नुकसान। अफगानिस्तान में सोवियत संघ और इराक तथा अफगानिस्तान में अमेरिका के अनुभव बताते हैं कि सैन्य श्रेष्ठता अपने आप टिकाऊ राजनीतिक नियंत्रण में नहीं बदलती। आधुनिक सेनाएं बेहद तेजी से किसी क्षेत्र पर कब्जा तो कर सकती हैं, लेकिन कड़े प्रतिरोध के बीच उस क्षेत्र का प्रशासन चलाना कहीं कठिन होता है। आज किसी क्षेत्र पर कब्जे का मतलब है अंतरराष्ट्रीय निगरानी, लगातार मीडिया कवरेज और लंबे प्रतिरोध को आकर्षित करना। इसकी वित्तीय और राजनीतिक कीमत बहुत अधिक होती है। ऐसे में सैन्य सफलता सेना के किसी अभियान का अंत नहीं, बल्कि एक बड़े रणनीतिक बोझ की शुरुआत बन सकती है। 21वीं सदी के संघर्षों ने बार-बार दिखाया है कि किसी क्षेत्र पर कब्जा करना और नतीजों पर नियंत्रण रखना अब एक ही बात नहीं रह गए हैं। इसके साथ ही तकनीक ने सुदूरवर्ती क्षेत्रों तक ताकत दिखाने की क्षमता को काफी बढ़ा दिया है। सटीक हमला करने वाले गोला-बारूद, लंबी दूरी की मिसाइलों, ड्रोन, साइबर क्षमताओं, सैटेलाइट सर्विलांस और एआई ने देशों को ऐसे अवसर मुहैया कराए हैं, जिनमें वे अपनी सीमाओं से बहुत दूर, जमीन पर बड़ी सेनाओं की तैनाती के बिना भी घटनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। वे दूर से ही किसी दूसरी जगह का बुनियादी ढांचा अस्त-व्यस्त कर सकते हैं और सैन्य क्षमताओं को कमजोर कर सकते हैं। बहुत से मामलों में अब लक्ष्य जीत नहीं, बल्कि दबाव बनाना होता है- यानी किसी क्षेत्र पर अधिकार कर उसका प्रशासन संभालने के बजाय प्रतिद्वंद्वी के नीति-निर्णयों को प्रभावित करना। यूक्रेन का युद्ध सटीकता के साथ गंभीर हमलों की अहमियत को बताता है। दोनों पक्ष मोर्चे से सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित सैन्य, औद्योगिक, ऊर्जा ढांचों को निशाना बनाते हैं। युद्धक्षेत्र में कौशल के प्रदर्शन के बजाय वे अपनी पहुंच के जरिए रणनीतिक नतीजे पाने की कोशिश करते हैं। इजराइल और ईरान युद्ध में तीव्र सैन्य टकरावों के बावजूद कोई भी पक्ष जमीनी कब्जा करने की कोशिश में नहीं दिखा। यह संघर्ष प्रतिरोध की क्षमता, रणनीतिक प्रभाव डालने और दूर बैठ कर नुकसान पहुंचाने के इर्द-गिर्द घूमता है। विदेशी क्षेत्र में सैनिकों की तैनाती और इसे लंबे समय बनाए रखना युद्ध का ऐसा रूप बन गया है, जो बेहद महंगा, राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सैन्य दृष्टि से जोखिमपूर्ण है। ऐसे अभियानों को बड़े पैमाने पर लॉजिस्टिक सपोर्ट और लंबे समय की राजनीतिक प्रतिबद्धता चाहिए। छोटे और अपेक्षाकृत कमजोर प्रतिद्वंद्वी इस हकीकत को जानते हैं। जैसे ही किसी ताकतवर देश के सैनिक जमीन पर उतरते हैं, वे नुकसान, हमले, राजनीतिक दबाव और रणनीतिक थकान के जोखिम में पड़ जाते हैं। इसीलिए सैन्य योजनाकार लगातार वैकल्पिक उपाय तलाशते हैं। जो भी पक्ष अपने प्रतिद्वंद्वी की गतिविधियों को बेहतर देख, सुन और समझ सकता है, वह बड़ी संख्या में सैनिकों की जान जोखिम में डाले बगैर महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर लेता है। इंटेलिजेंस, सर्विलांस और सटीक हमले अब ऐसे साधन हैं, जो सेनाओं की जमीन पर मौजूदगी से बराबरी करते हैं। आज किसी क्षेत्र पर कब्जे का मतलब है निगरानी और लंबे प्रतिरोध को आकर्षित करना। इसकी कीमत बहुत अधिक है। ऐसे में सैन्य सफलता किसी अभियान का अंत नहीं, बड़े रणनीतिक बोझ की शुरुआत बन सकती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)