अनिल चौपड़ा का कॉलम:युद्ध के नियमों को नए सिरे से परिभाषित किया है हमने
6-7 मई 2025 की रात को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया था। यह 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में चलाया गया एक सुनियोजित और समयबद्ध सैन्य अभियान था। इसके बाद अगले 88 घंटों में जो कुछ हुआ, वह भारत के नए और पूरी तरह से विकसित रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था : एक ऐसा सिद्धांत, जिसे स्पष्ट उद्देश्य, तकनीकी आत्मनिर्भरता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्र की एकजुटता से परिभाषित किया जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर ने परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों के बीच सैन्य टकराव के नियमों को फिर से लिखा और एक ऐसी मिसाल कायम की, जो आने वाले कई दशकों तक दक्षिण एशिया की सुरक्षा की दिशा तय करेगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार भारत ने एक ऐसे दुश्मन के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीत हासिल की, जो असल में एक ही मोर्चे पर दो देशों- पाकिस्तान और चीन की संयुक्त ताकत के रूप में सामने आया था। चीन ने यों तो खुद को इस मामले से अलग रखा, लेकिन उसने पाकिस्तान को सक्रिय उपग्रह खुफिया जानकारी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में सहायता, साइबर सहायता और पीएल-15 जैसी दृष्टि-सीमा से परे (बीवीआर) मिसाइलों सहित अग्रिम मोर्चे के सैन्य साजो-सामान उपलब्ध कराए थे। आधुनिक संघर्षों की एक प्रमुख विफलता- रूस-यूक्रेन युद्ध के पांच साल लंबे संघर्ष से लेकर पश्चिम एशिया के मौजूदा युद्ध क्षेत्र तक- यह रही है कि इनमें बाहर निकलने की कोई रणनीति नहीं होती। ऐसे अभियान, जिनका कोई निश्चित अंत न हो, अर्थव्यवस्थाओं को कमजोर करते हैं, जनता का मनोबल गिराते हैं तथा न तो जीत दिलाते हैं और न ही शांति। ऑपरेशन सिंदूर ने सोच-समझकर इस जाल से खुद को बचाया। उसने वह कर दिखाया जो बहुत कम आधुनिक सेनाएं कर पाती हैं : पहली मिसाइल दागे जाने से पहले ही सफलता की परिभाषा तय कर लेना। भारत इस अभियान में अपने उद्देश्य को लेकर पूरी तरह स्पष्ट था : आतंकी ढांचे और उसे पनाह देने वालों को खत्म करना और अपनी शर्तों पर बाहर निकल आना- जिसमें किसी भी तरफ आम नागरिकों को कोई नुकसान न हो। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने पर्याप्त खुफिया जानकारी के आधार पर 9 लक्ष्य तय किए थे। इनमें से प्रत्येक को लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकवादी इको-सिस्टम को बनाए रखने में उनकी विशिष्ट भूमिका के लिए चुना गया था। पहला हमला सिर्फ 23 मिनट में पूरा कर लिया गया। पूरा अभियान 88 घंटों के अंदर खत्म हो गया। इसके बाद भारत ने दुश्मन को अपनी शर्तों पर युद्धविराम के लिए मजबूर कर दिया। यह सिद्धांत- यानी एक उद्देश्य के साथ प्रवेश करना, सटीकता के साथ कार्य करना और बिना किसी अतिरेक के बाहर निकलना- नियंत्रित युद्ध की एक ऐसी शैली है, जिसका प्रदर्शन आधुनिक सैन्य इतिहास में विरले ही देखने को मिलता है। ऑपरेशन सिंदूर के भौगोलिक दायरे ने भी पिछली सीमाओं को तोड़ा। भारत ने अपने शुरुआती हमले सिर्फ पीओके तक ही सीमित नहीं रखे, बल्कि वह पाकिस्तान के मुख्य भूभाग पंजाब के भी काफी अंदर तक पहुंच गया। भारतीय सीमा से 140 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर बेहद सटीक हमले किए गए। संदेश स्पष्ट था : कोई भी ठिकाना हमारी पहुंच से बाहर नहीं है। इन हमलों ने पाकिस्तान की शह पर काम करने वाले सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठनों की कमान-व्यवस्था को पूरी तरह से तबाह कर दिया। सबसे अहम बात यह है कि ऑपरेशन सिंदूर ने परमाणु ब्लैकमेल की पोल खोल दी। जबकि दशकों से पाकिस्तान की परमाणु छत्रछाया का इस्तेमाल राज्य-प्रायोजित आतंकवाद को छूट देने के लिए किया जाता रहा था। (ये लेखक के अपने विचार हैं)