अमिताभ कांत का कॉलम:टूरिज्म डॉलर भी दे सकता है और जॉब्स भी
विदेशी मुद्रा पाने और नौकरियां क्रिएट करने के सबसे तेज तरीकों में पर्यटन भी है, जबकि उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। एक ऐसे समय में, जब वैश्विक अनिश्चितता, ऊर्जा कीमतों में अस्थिरता, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और भू-राजनीतिक झटके चालू खाते पर दबाव डाल रहे हैं, टूरिज्म हमारी अर्थव्यवस्था के लिए स्टैबलाइजर का काम कर सकता है। विदेशी पर्यटक सीधे हमारी अर्थव्यवस्था में डॉलर लेकर आते हैं। वे हॉस्पिटैलिटी, परिवहन, पर्यटन स्थलों, स्मृति-चिह्नों, सांस्कृतिक अनुभवों और स्थानीय व्यंजनों पर पैसा खर्च करते हैं। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र अपने आप में रोजगार सृजन का एक शक्तिशाली स्रोत है। पर्यटन में जुड़ा हर प्रत्यक्ष रोजगार 13 अप्रत्यक्ष रोजगारों को भी जन्म देता है। वेटर, शेफ, ड्राइवर, गाइड, शिल्पकार, होमस्टे संचालक, डिजिटल मार्केटर और हजारों-छोटे स्थानीय उद्यम इसके कुछ उदाहरण मात्र हैं। जहां मैन्युफैक्चरिंग-आधारित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश- जिसे दीर्घकालिक समाधान के रूप में प्राथमिकता दी जाती है- साकार होने में वर्षों लेता है और सार्थक स्तर पर विदेशी मुद्रा उत्पन्न करने में उससे भी अधिक समय लगाता है, वहीं पर्यटन किसी पर्यटक के निर्णयों को कुछ ही महीनों में डॉलरों में परिवर्तित कर देता है। भारत की एविएशन कंपनियों ने 2000 से अधिक नए विमानों का ऑर्डर दिया है, जिनकी आपूर्ति आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ेगी। ऊपरी तौर पर तो यह एविएशन क्षेत्र की महत्वाकांक्षा की कहानी प्रतीत होती है, किंतु यदि इसके साथ ही इन विमानों को विदेशी पर्यटकों से भरने के प्रयास नहीं किए गए, तो उलटा परिणाम भी मिल सकता है : भारतीयों के लिए विदेश यात्रा अधिक आसान और सस्ती हो जाएगी, जिससे कहीं अधिक मात्रा में बहुमूल्य विदेशी मुद्रा देश से बाहर जाएगी। पिछले चार वर्षों में भारत के विदेशी पर्यटन मार्केटिंग बजट को लगभग शून्य तक घटा दिया गया है। परिणाम भी अपेक्षित हैं। वर्ष 2024 में भारत में 99 लाख अंतरराष्ट्रीय पर्यटक आए- जो महामारी-पूर्व के सर्वोच्च स्तर से लगभग 10% कम हैं। जहां भारत के सभी प्रमुख प्रतिस्पर्धी देश 2019 के स्तर को पार कर चुके हैं, हम अब भी उस स्थिति से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे हैं। इसलिए हमारे विदेशी पर्यटन मार्केटिंग बजट में की गई तीव्र कटौती आश्चर्यजनक है। एक विदेशी पर्यटक अपनी प्रत्येक यात्रा पर भारत के जीडीपी में 3,000 डॉलर का योगदान देता है, जबकि एक घरेलू पर्यटक का योगदान केवल 75 डॉलर होता है- यानी 40 गुना का अंतर। मार्केटिंग पर 20 करोड़ डॉलर का निवेश 10 लाख अतिरिक्त विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करेगा, जिससे 3.6 अरब डॉलर का आर्थिक मूल्य सृजित होगा, 40 करोड़ डॉलर की जीएसटी प्राप्ति होगी और 2.83 लाख नए रोजगार उत्पन्न होंगे। यानी मार्केटिंग पर खर्च किए गए प्रत्येक डॉलर पर 18 गुना रिटर्न प्राप्त होगा। केवल 55,000 अतिरिक्त पर्यटक- जो भारत के वर्तमान टूरिस्ट-बेस का मात्र 0.5% हैं- पूरे मार्केटिंग खर्च की भरपाई कर देंगे। ये कोई अनुमान नहीं हैं। ये वही परिणाम हैं, जिन्हें इन्क्रेडिबल इंडिया अभियान ने प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करके दिखाया था। वैश्विक पर्यटन में डिजिटल टेक्नोलॉजी बड़े बदलाव ला रही है। और यही वह क्षेत्र है, जिसमें भारत की अनुपस्थिति हमारे लिए महंगी साबित हो रही है। आज पर्यटन से संबंधित कुल बिक्री का 78% ऑनलाइन होता है, 70% बुकिंग मोबाइल उपकरणों पर पूरी की जाती हैं और 45% लेन-देन ऑनलाइन ट्रैवल एजेंसियों के माध्यम से होता है। प्रतिस्पर्धा का मैदान अब यूट्यूब प्री-रोल्स, सोशल मीडिया एल्गोरिदम, प्रोग्रामेटिक डिस्प्ले और इन्फ्लुएंसर नेटवर्कों पर स्थानांतरित हो चुका है। ये ऐसे चैनल्स हैं, जहां व्यय को मापा जा सकता है, टारगेटिंग सटीक होती है और रिटर्न ऑन इनवेस्टमेंट का लगभग रियल-टाइम में आंकलन किया जा सकता है। भारत के पास बुनियादी ढांचा तो है, किंतु वह उसका लाभ उठाने में विफल रहा है। इन्क्रेडिबल इंडिया के फेसबुक पर 19 लाख और इंस्टाग्राम पर 7.85 लाख ही फॉलोअर्स हैं। इतने ही फॉलोअर्स वाले सऊदी अरब ने जहां एक ही महीने में 2.7 करोड़ कंटेंट व्यू अर्जित किए, वहीं भारत केवल 3.88 लाख व्यू तक सीमित रहा। मंच मौजूद है, किंतु भारत लगभग एक दशक से वैश्विक मार्केटिंग परिदृश्य से पूरी तरह अनुपस्थित है। इसकी भारी कीमत हमारे पर्यटन क्षेत्र को चुकानी पड़ रही है। केवल मार्केटिंग भी काफी नहीं होगी। हमें मिशन मोड में पर्यटन क्षेत्र को डी-रेगुलेट भी करना होगा। होटल, रेस्तरां, होमस्टे, परिवहन संचालक और पर्यटन सेवा प्रदाता अनेक लाइसेंसों, प्रक्रियाओं और निरीक्षणों के बोझ तले काम करते हैं। जो परियोजनाएं दूसरे एशियाई देशों में 18 महीनों में पूरी हो जाती हैं, उन्हें भारत में कहीं अधिक समय लगता है। एकीकृत लाइसेंस व्यवस्था, डिजिटलीकरण और स्वचालित नवीनीकरण को लागू किया जाना चाहिए। हमारे प्रत्येक राज्य को पर्यटन का अग्रदूत बनना होगा। प्रत्येक राज्य को 15 प्रमुख पर्यटन स्थलों की पहचान कर उन्हें ऐसे समग्र पर्यटन इको-सिस्टम में विकसित करना चाहिए, जिनमें पहुंच, आवास, अनुभव, आयोजन, सुरक्षा, स्वच्छता, स्थानीय उद्यम और मार्केटिंग- सभी का समावेश हो। कोई डेस्टिनेशन केवल इसलिए तैयार नहीं माना जा सकता कि वहां सड़कें, होटल या संकेतक उपलब्ध हैं। वह तभी नजरों में आता है, जब कोई यात्री उसकी विशिष्टता को खोज सके, उसकी विश्वसनीयता का आकलन कर सके, बुक किए जा सकने वाले अनुभवों की पहचान कर सके, आसानी से लेन-देन कर सके और इस बात पर भरोसा कर सके कि उसे अपेक्षानुरूप अनुभव प्राप्त होगा। पर्यटन क्षेत्र की प्रतिस्पर्धात्मकता अब इस पर भी निर्भर करेगी कि कोई डेस्टिनेशन कंटेंट-क्रिएटर्स के अनुकूल है या नहीं, उसे आसानी से ऑनलाइन खोजा जा सकता है या नहीं, वह लेन-देन के लिए तैयार है या नहीं और उस पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं। हमें कंटेंट-क्रिएशन अर्थव्यवस्था को भी पर्यटन की एक रणनीति के रूप में अपनाना होगा। सरकारी अभियान जागरूकता उत्पन्न कर सकते हैं, किंतु विश्वास का निर्माण कंटेंट-क्रिएटर्स करते हैं। एक उत्कृष्ट वीडियो वह प्रभाव उत्पन्न कर सकता है, जो कोई ब्रोशर नहीं कर सकता। 2.83 लाख नए रोजगार...
एक विदेशी पर्यटक अपनी प्रत्येक यात्रा पर जीडीपी में 3,000 डॉलर का योगदान देता है। मार्केटिंग पर 20 करोड़ डॉलर का निवेश 10 लाख अतिरिक्त विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करेगा, जिससे 3.6 अरब डॉलर का मूल्य सृजित होगा, 40 करोड़ डॉलर की जीएसटी प्राप्ति होगी और 2.83 लाख नए रोजगार उत्पन्न होंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)