एन. रघुरामन का कॉलम:अंतिम निर्णय लेना हमेशा ‘कैप्टन’ की जिम्मेदारी होती है
15 जनवरी 2009 की दोपहर कैप्टन चेस्ली ‘सली’ सलेनबर्गर और फर्स्ट ऑफिसर जेफ स्काइल्स न्यूयॉर्क के ला-गार्डिया एयरपोर्ट से यूएस एयरवेज फ्लाइट 1549 में सवार हुए। उड़ान भरने के तीन मिनट बाद लगभग 2,800 फीट (850 मीटर) की ऊंचाई पर एयरबस ए320 पक्षियों के झुंड से टकरा गई। इससे दोनों इंजन क्षतिग्रस्त हो गए। हालांकि उन्हें वापस लौटने या समीप के किसी एयरपोर्ट पर उतरने की सलाह दी गई थी, लेकिन अपने दशकों के अनुभव से कैप्टन को लगा कि विमान के पास न पर्याप्त गति बची है और न ही ऊंचाई। उन्होंने तत्काल फैसला किया और स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल का पालन न करते हुए मन की बात मानी। अधिक सोच-विचार किए बिना उन्होंने बर्फीली हडसन नदी पर इमरजेंसी कंट्रोल्ड वाटर लैंडिंग (डिचिंग) का निर्णय किया। उस निर्णय में उन्होंने सच में अपनी और सभी यात्रियों की जिंदगी दांव पर लगा दी थी। सभी 155 यात्री और क्रू सदस्य बच गए। अगले दिन मैंने इसी वास्तविक घटना पर बेंगलुरु में डीएनए अखबार में संपादकीय भी लिखा। जहां यात्री और उनके परिवार सली को हीरो मान रहे थे, वहीं बीमा लॉबी उनके कृत्य को गलती साबित करने की कोशिश कर रही थी। आखिरकार अदालत में सली जीत गए। 2016 में इस वास्तविक घटना पर एक फिल्म ‘सली’ भी बनी। मुझे नहीं पता था कि इस मंगलवार, यानी 9 जून को मैं यही वास्तविक कहानी कुछ यात्रियों को लाइन-दर-लाइन सुनाऊंगा, वह भी पांच घंटे तक एक विमान में बैठे हुए। मंगलवार को दोपहर 3.50 बजे फ्लाइट नंबर 6ई 5131, जो एक एयरबस 321 नियो (रजिस्ट्रेशन नंबर: वीटी-एनएचएन) थी, 221 यात्रियों के साथ मुंबई के छत्रपति शिवाजी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के टर्मिनल-1 से अपने शेड्यूल टाइम पर रवाना हुई। कुछ यात्रियों ने खुशी जताई कि ‘वाह, हम समय पर हैं।’ यह सिर्फ नियमित यात्रियों के लिए ही नहीं, बल्कि कैप्टन गौरव और उनके सेकंड-इन-कमांड आशीष के लिए भी सामान्य दिन ही था। विमान धीरे-धीरे टर्मिनल-1 के सबसे दूर वाले छोर से टर्मिनल-2 के दूसरे सिरे की ओर बढ़ा और एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) से रन-वे पर प्रवेश की अंतिम मंजूरी मिलने का इंतजार करने लगा, ताकि भोपाल पहुंचने के लिए टेक-ऑफ कर सके। यात्रियों के लिए विमान की दायीं तरफ की खिड़कियों से इस इंतजार वाली जगह को देखना काफी रोमांचक था। इसी जगह पर महज एक मिनट के अंतराल में एक के बाद एक कई विमान उतरते दिखते हैं और साथ ही विमान के पीछे के छोर पर विमान एक के पीछे एक कतार में खड़े नजर आते हैं, जैसे बंपर-टु-बंपर ट्रैफिक में कारें खड़ी होती हैं। शाम 4.03 बजे एटीसी ने क्लीयरेंस दी और पायलट ने राइट टर्न लेकर विमान को सफेद पेंट से मार्क की गई जगह पर कुछ सेकंड के लिए खड़ा कर दिया ताकि इंजन को थ्रॉटल देकर अधिकतम स्पीड हासिल कर सके। विमान मुख्य रनवे पर तेजी से आगे बढ़ने लगा। अगले 5-7 सेकंड में उसका अगला पहिया हवा में उठने वाला था कि कैप्टन ने इमरजेंसी ब्रेक लगा दिए। स्पीड कम करने के लिए थ्रॉटल बंद कर दिया और टेक-ऑफ टाल दिया। प्लेन के अचानक रुकने से यात्रियों की गर्दनों में झटके लगे, लेकिन कोई घायल नहीं हुआ। हालांकि केबिन में भय की लहर दौड़ गई। कैप्टन ने तत्काल विमान को पार्किंग-बे तक पहुंचाया। शायद एटीसी ने ऐसे निर्देश दिए थे, ताकि व्यस्त हवाई यातायात बाधित न हो। एयरक्राफ्ट मेंटेनेंस इंजीनियरों की टीम ने संदिग्ध खराबी की जांच शुरू कर दी। दूसरी बार टेक-ऑफ से करीब दो घंटे पहले कैप्टन पैसेंजर एड्रेसिंग सिस्टम पर आए और कहा कि ‘तकनीकी दिक्कतों की वजह से हमें ये फैसला लेना पड़ा, क्योंकि सुरक्षा हमारी प्राथमिकता है।’ और वे बिल्कुल सही थे। फंडा यह है कि अगर आप किसी भी चीज के कैप्टन हैं तो बगैर यह सोचे कि ‘लोग क्या कहेंगे’, आपको ही अंतिम फैसला लेना होगा। क्योंकि उस फैसले से जिंदगियां जुड़ी होती हैं।