एन. रघुरामन का कॉलम:इनक्लूसिव ग्रोथ के लिए सामूहिक खेती भी अपना सकते हैं
तेलंगाना सरकार की कृषि संबंधी विशेषज्ञ समिति ने मंगलवार को ऐसे प्रस्ताव पर चर्चा की, जो देशभर के किसानों का जीवन आसान बना सकता है। हालांकि यह आइडिया अभी प्लानिंग स्टेज पर ही है, लेकिन इसे धरातल पर उतारने के तरीकों पर हुई दो बैठकों से किसानों में काफी उम्मीद जगी है। तेलंगाना सरकार 20.5 लाख स्कूली और इंटरमीडिएट स्टूडेंट्स के ब्रेकफास्ट प्रोग्राम के लिए किसानों से सीधे सब्जियां खरीदने की योजना बना रही है। इसके लिए रोजाना करीब 1.2 लाख किलो सब्जियों की जरूरत होगी। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत सरकार स्टूडेंट्स के लिए खाना बनाने और सप्लाई करने वाली 39 केंद्रीकृत रसोइयों के आसपास रहने वाले किसानों पर फोकस करेगी। कृषि और बागवानी अधिकारी इन रसोइयों के आसपास मौजूदा सब्जी उत्पादकों और सब्जी की खेती के इच्छुक किसानों की पहचान करेंगे। इस पहल का मकसद सीधी खरीद के जरिए किसानों को एक सुनिश्चित बाजार देना, बिचौलियों की भूमिका कम करना और किसानों को बेहतर तथा अधिक स्थिर कीमत दिलाना है। अतिरिक्त रोजगार और आय के अवसर पैदा करने के लिए अधिकारियों ने सब्जी की खेती और सप्लाई में ग्रामीण महिला समूहों को शामिल करने पर भी चर्चा की। प्रस्तावित मॉडल में किसानों, महिला समूहों, भोजन उपलब्ध कराने वाले संगठनों और छात्रों के बीच सीधे लिंकेज से सभी पक्षों को फायदा होने की उम्मीद है। इससे किसानों को भरोसेमंद बाजार, महिला समूहों को आजीविका के अवसर, भोजन उपलब्ध कराने वाले संगठनों को कच्चे माल की नियमित सप्लाई और स्कूली बच्चों को ताजी सब्जियां मिल सकेंगी। इससे मुझे इंदौर के कलेक्टर कार्यालय में नवंबर 2025 में आए एक ऐसे प्रस्ताव की याद आई, जिसमें सामूहिक खेती की विस्तृत योजना दी गई थी। ‘नेशनल मिशन ऑन नेचरल फार्मिंग’ शीर्षक वाले इस प्रस्ताव में सरकार से किसानों के लिए उचित कीमत और लंबे समय की लीज पर 220 एकड़ जमीन मांगी गई थी। इस जमीन पर किसानों द्वारा उगाई गई सब्जियों को पुलिस ट्रेनिंग सेंटरों तथा बीएसएफ सेंटर्स जैसे सेंटरों में खरीदा जाता, जहां किचन और मेस चलते हैं। 200 एकड़ जमीन पर सब्जियों की खेती की जाती, जबकि एक एकड़ में शहर की सड़कों पर घूमने और ट्रैफिक जाम करने वाली गायों के लिए शेल्टर बनता। स्वस्थ गायों का कुछ भी उपयोग किया जा सकता है, जबकि उनके ‘गोबर’ से 200 एकड़ जमीन के लिए खाद बनाई जा सकती है। अब सवाल यह था कि उन्हें खिलाएगा कौन? प्रस्ताव में कहा गया था कि बची हुई जमीन में से नौ एकड़ पर घास उगाई जाए और गायों को चराया जाए। चूंकि ये दुधारू पशु नहीं हैं तो उनके गुजारे के लिए महज घास ही पर्याप्त होगी। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि शेष 10 एकड़ जमीन में से एक एकड़ ऐसे व्यक्ति के लिए रखी जानी चाहिए, जो ट्रैक्टर जैसे तमाम उपकरणों और अन्य सुविधाओं में निवेश कर सके। उन उपकरणों को लीज पर जमीन लेने वाले किसानों को किराए पर दिया जा सकता है। इलाके में रोशनी के लिए एक एकड़ में ‘गोबर गैस प्लांट’ बन सकता है। बची जमीन पर नर्सरी, हाइड्रोपोनिक्स, अजेलिया की खेती, औषधीय खेती, पशुपालन, एग्रोफॉरेस्ट्री, ग्रीनहाउस, उपज की बंधाई, पैकेजिंग सुविधा, लेबलिंग सेंटर और 200 एकड़ की पूरी उपज के लिए कलेक्टिव मार्केटिंग सेंटर बनाने जैसी गतिविधियां की जा सकती हैं। एग्रीकल्चर डिग्री पूरी करने के बाद इस क्षेत्र में आने वाले युवा ऐसे क्लस्टरों में ट्रेनिंग कर सकते हैं। फंडा यह है कि ऐसे आइडिया किसानों को भरोसेमंद बाजार देते हैं, ग्रामीण महिला समूहों के लिए आजीविका के अवसर बनाते हैं और कई सामूहिक रसोइयों व मेस के लिए ताजी सब्जियों की नियमित सप्लाई सुनिश्चित करते हैं।