एन. रघुरामन का कॉलम:एंटरटेनिंग आंत्रप्रेन्योर बोरियत को भी बिजनेस में बदल देते हैं

Jul 24, 2026 - 06:09
एन. रघुरामन का कॉलम:एंटरटेनिंग आंत्रप्रेन्योर बोरियत को भी बिजनेस में बदल देते हैं
जिंदगी जब ठहर-सी जाए, एंग्जायटी बढ़ने लगे और आप खुद को चारदीवारी में फंसा महसूस करें तो आप क्या करते हैं? मैं यह स्थिति अकसर विश्वविद्यालयों के नए स्टूडेंट्स, खासकर होस्टलर्स में देखता हूं, जिन्हें समझ नहीं आता कि रविवार को नए शहर में आखिर क्या करें। सबसे पहले उन्हें यही लगता है कि यहां से भाग छूटें। वे बिना सोचे-समझे अंतहीन वीडियो स्क्रॉल करते हैं, आंखें दुखने तक बिंजवॉच करते हैं या फिर वीडियो गेम्स में खो जाते हैं। इससे उन्हें कुछ समय की राहत तो मिलती है, लेकिन आखिर में वे खालीपन महसूस करते हैं। संक्षेप में, वे एंटरटेनमेंट को कंज्यूम तो करते हैं, लेकिन शायद ही उसे क्रिएट करने का सोचते हैं। लेकिन क्या हो अगर बोरियत दूर करने का आपका कोई साधारण तरीका, कोई लेट-नाइट स्ट्रेस-रिलीफ डूडल या पालतू डॉग से जुड़ा कोई मजाक ही करोड़ रुपए के ग्लोबल स्टार्टअप का बीज बन जाए? लखनऊ की बहनों, मृणालिनी मित्रा (27) और न्योनिका (26) की यह असाधारण कहानी आज होस्टल के कमरे में बैठे किसी युवा के लिए बेहतरीन सीख है। यह साबित करती है कि जब आप एंटरटेनमेंट को इनोवेशन की भावना से देखते हैं तो लिविंग रूम में किया साधारण काम भी ग्लोबल बिजनेस में बदल सकता है। कुछ साल पहले मृणालिनी और न्योनिका वहीं खड़ी थीं, जहां पहुंचने का सपना भारत के कई महत्वाकांक्षी युवा देखते हैं। मृणालिनी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट थीं और न्योनिका ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डिग्री ली थी। विदेशों में प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट इंटर्नशिप और शानदार ग्लोबल कॅरिअर उनका इंतजार कर रहे थे। तभी उन्होंने सुना कि उनकी मां को कैंसर है तो यह उनके लिए बड़ा सदमा था। एक पल भी सोचे बिना दोनों बहनें सारे प्लान छोड़कर मां की देखभाल के लिए लखनऊ के राजेंद्र नगर स्थित घर लौट आईं। घर का माहौल भारी था और दोनों पर बेहद भावनात्मक दबाव था। इससे निपटने के लिए परिवार ने एक नियम बनाया कि हर रविवार बोर्ड गेम्स खेले जाएंगे। यह कठिन समय में मन को थोड़ी-सी खुशी देने का जरिया था। जैसे वनीला आइसक्रीम में चॉकलेट मिलाई जाती है, वैसे ही जब दोनों बहनों ने एंटरटेनमेंट में इनोवेशन को मिलाया तो उनकी साधारण पारिवारिक कहानी उद्यमिता की मिसाल बन गई। ज्यादातर लोग बस बाजार से कोई साधारण-सा बोर्ड गेम खरीद लेते हैं। लेकिन मित्रा बहनों ने एंटरटेनमेंट के साथ इनोवेशन करने का फैसला किया और अपनी एक दुनिया बनाने की ठानी। कठिन हालात में घर में खुशी के पल लाने वाले अपने पालतू डॉग ‘यासु’ से प्रेरित होकर बहनों ने कुछ कैरेक्टर्स की स्केचिंग शुरू की। खाली कार्ड्स पर पौराणिक कथाएं, हाथ की चित्रकारी, ओरिजिनल म्यूजिक और निजी किस्से पिरोए। शुरुआत में यह सिर्फ तनाव दूर करने की थैरेपी जैसा था, ताकि वे एक-दूसरे को हंसा सकें और रोजमर्रा में खुशी से जुड़े रहें। उन्होंने कोई बिजनेस प्लान नहीं बनाया। बस, थोड़ा मजा करने का बेहतर तरीका ईजाद किया। लेकिन जब उन्होंने हाथ से बनाए कैरेक्टर्स यूट्यूब पर शेयर किए तो वे इंटरनेट पर देखे जाने लगे। लोगों का जबरदस्त इंगेजमेंट मिला। अनजान भी पूछने लगे कि यह गेम कहां से खरीद सकते हैं। इसी पल बहनों को एहसास हुआ कि उनके निजी स्ट्रेस-बस्टर में कारोबारी संभावना भी है। ऐसे समय में जब टेक स्टार्टअप लागत बचाने के लिए एआई-जनरेटेड आर्टवर्क इस्तेमाल कर रहे हैं, इन बहनों ने एक साहसिक और उम्मीदों के विपरीत राह चुनी- हर चित्र अपने हाथों से बनाया। इस महीने की शुरुआत में उनके इस ‘लिविंग रूम स्ट्रेस-बस्टर’ ने एक लाख डॉलर (करीब 95.45 लाख रुपए) से ज्यादा का रेवेन्यू कमाया। 40 देशों में इस गेम के खरीदार हैं। फंडा यह है कि जब आप अपने फन को इनोवेटिव बनाते हैं, विचारों को डॉक्यूमेंट में उतारते हैं और उन्हें ऑनलाइन शेयर करते हैं, साथ ही मानते हैं कि आपकी कल्पना महज समय बिताने का साधन नहीं बल्कि एक संभावित सम्पत्ति है तो कोई साधारण-सा खेल भी ग्लोबल बिजनेस का बीज बन सकता है।