एन. रघुरामन का कॉलम:एआई की दुनिया में असलियत में लोगों से मिलना अब भी फायदेमंद है
‘गूगल… एयरपोर्ट पर रो रहे बच्चे को कैसे संभालें?’ यह सवाल उन क्रिकेटप्रेमियों को जाना-पहचाना लगेगा, जिन्होंने हाल ही में आईपीएल मैच देखे थे। इससे शायद आपको ओपनएआई के चैटजीपीटी वाले उस विज्ञापन की याद आए, जिसमें फ्लाइट लेट होने की वजह से दो लोग एयरपोर्ट पर फंसे हैं। समय बिताने को वे वॉइस कमांड से खेलों पर मजेदार बहस करते हैं। क्रिकेट को लेकर उनकी नोकझोंक चल ही रही होती है कि पीछे एक बच्चा जोर-से रोने लगता है। खेल की बहस से हटकर लड़की बॉयफ्रेंड की ओर देखती है और वही सवाल पूछती है। लड़का सोचता रह जाता है कि भला यह कैसा सवाल है और यहीं विज्ञापन समाप्त हो जाता है। ऐसी दुनिया में, जहां हर कोई एआई असिस्टेंट इस्तेमाल कर रहा है, डॉक्टरों को भी पीछे नहीं रहना चाहिए। आखिरकार, उनके लिए कोई दो दिन एक समान नहीं होते। हर नया दिन, नए मरीज और नई समस्याएं लाता है। पश्चिमी देशों से आई खबरें बताती हैं कि डॉक्टरों के बीच ओपनएविडेंस एआई ऐप तेजी से लोकप्रिय हो गया है, जो मेडिसिन क्षेत्र का चैटबॉट है। विकसित देशों में ज्यादातर डॉक्टर खास मेडिकल सवाल पूछने या डायग्नोस्टिक के बारे में आइडिया शेयर करने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। सिर्फ मई में ही उन्होंने 3 करोड़ सवालों और कंसल्टेशन्स के लिए इसका इस्तेमाल किया। ओपनएविडेंस इस क्षेत्र में फ्रंट-रनर बन गया, क्योंकि वह अपने एआई मॉडलों को प्रशिक्षित करने के लिए केवल मेडिकल जर्नल और हाई-क्वालिटी रिसर्च डेटा का उपयोग करता है। सबसे संभावित डायग्नोसिस की समरी बताता है और उन अन्य महत्वपूर्ण डायग्नोसिस के बारे में भी बताता है, जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। हर समरी के साथ मूल रिसर्च आर्टिकल्स के लिंक भी देता है। एआई निश्चित ही मेडिसिन में लंबे समय से व्याप्त समस्याओं को हल कर रहा है। फिर भी मेडिकल विशेषज्ञ मानते हैं कि शुरुआती उत्साह के साथ अत्यधिक सावधानी भी होनी चाहिए। मेडिसिन जैसे अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र में किसी ऐप को इतनी तेजी से अपनाए जाने ने मेडिकल पेशेवरों में यह चिंता बढ़ा दी है कि तकनीक कब और कैसे इस्तेमाल करनी चाहिए। यह उन दिनों की याद भी दिलाता है कि कैसे युवा डॉक्टरों से बड़े अस्पतालों में काम शुरू कराया जाता था। वर्षों पहले नए डॉक्टरों को पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी जैसे छोटे विभागों में एक हफ्ता या अधिक समय बिताने को कहा जाता था। इसलिए नहीं कि उन्हें इन विभागों के कामकाज की जानकारी नहीं होती थी, बल्कि उन्हें अनुभव कराया जाता था कि किसी चुनिंदा अस्पताल में ये विभाग कैसे काम करते हैं। पैथोलॉजिस्ट डायग्नोसिस की पुष्टि के लिए अकसर अलग-अलग जांच पद्धति इस्तेमाल करते हैं। मसलन, वे शुरुआती पॉजिटिव या निगेटिव जांच के लिए पहले रैपिड स्क्रीनिंग टेस्ट करते हैं, फिर निर्णायक और मापने योग्य परिणामों के लिए उन्नत तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए डॉक्टरों को यह समझना जरूरी होता है कि उनकी लिखी गई जांचें किस प्रक्रिया से गुजरती हैं। एक ही नमूने की 20 बार जांच करने पर स्टैंडर्ड डेविएशन, इक्विपमेंट कैलिब्रेशन और इस्तेमाल हुए रसायनों (रिएजेंट्स) के कारण आंकड़ों में मामूली अंतर आ सकता है। जब डॉक्टर यह समझते हैं कि पैथोलॉजी विभाग कैसे काम करता है, तो वे मरीज के हित में बेहतर फैसले कर पाते हैं। पुराने दौर में डॉक्टर सीधे इंटरकॉम उठा कर पैथोलॉजिस्ट से पूछ लेते थे कि टेस्ट कैसे किया और परिणामों में अंतर क्यों आया। दुर्भाग्य से आज बड़े अस्पतालों में पहले ही दिन से काम का दबाव इतना होता है कि युवा डॉक्टरों को शायद ही इन विभागों में ले जाया जाता हो। भारत में भी मैंने कई डॉक्टरों को शुरुआती जानकारी के लिए एआई इस्तेमाल करते देखा है। कुछ डॉक्टरों के पास मरीज की क्विक मेडिकल समरी तैयार करने वाले पेड वर्जन भी हैं, लेकिन फिर भी सटीक निदान के लिए वे बहुत हद तक इंसानी सहयोग पर ही भरोसा करते हैं। फंडा यह है कि निस्संदेह एआई जानकारी का एक समंदर सामने रख देता है, लेकिन लोगों से मिलना और असल जिंदगी की परिस्थितियों से सीखना आज भी हमें बेहतर जानकारी रखने वाला इंसान बनाता है। त्वरित नॉलेज ट्रांसमिशन के लिए एआई भविष्य का बेहतर टूल होगा, लेकिन वह अतिरिक्त सहायक के तौर पर रहना चाहिए, ह्यूमन इंटेलिजेंस और आपसी सहयोग का विकल्प बनकर नहीं।