एन. रघुरामन का कॉलम:किसी की शेमिंग किए बिना आइडेंटिटी से प्रभावित करें तब चमत्कार होता है
2018 के वो टॉयलेट-क्लीनर वाले विज्ञापन याद कीजिए, जिनमें बॉलीवुड स्टार अक्षय कुमार हमारे टीवी स्क्रीन पर आकर बताते थे कि अपने टॉयलेट को साफ कैसे रखा जाए? एक फैन के घर जाकर और उसे अपने द्वारा प्रमोट किया जा रहा प्रोडक्ट खरीदने को राजी करने के बाद वे वादा करते हैं कि ‘ये तो मान गईं, अगला घर आपका।’ हममें से कई लोगों ने चुपचाप यह चाहा भी होगा कि कम से कम इसी बहाने अक्षय हमारे घर भी आएं। लेकिन वे कभी नहीं आए। खैर, मजाक अपनी जगह लेकिन भारत में टॉयलेट क्लीनिंग के विज्ञापनों का काम हमेशा से अजीब रहा है। उन्हें एक फंक्शनल प्रोडक्ट बेचना होता है, उसका नजर आने वाला सबूत दिखाना होता है और यह भी ध्यान रखना होता है कि उसे पूरा परिवार साथ देख सके। टॉयलेट क्लीनर हार्पिक बनाने वाली कंपनी ‘रेकिट’ दर्शकों को दूर किए बिना बाथरूम को मुख्यधारा की स्क्रीन पर लाने में सफल रही थी। 2018 में हार्पिक ने स्वच्छता संबंधी पहल के तहत अक्षय कुमार को ब्रांड एंबेसडर बनाया। कंपनी ने उन्हें अपने ‘हर घर स्वच्छ’ मिशन और हाइजीन संबंधी आदतों में बदलाव के संदेश के साथ जोड़ा। इसी 2018 में सर्बियाई मॉडल लाजार जानकोविच मॉडलिंग और कमर्शियल कॉन्ट्रैक्ट के लिए भारत आए। उन्होंने छह साल इंतजार किया कि लोगों का हाइजीन बिहेवियर बदले, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 20 राज्यों की यात्रा में उन्होंने एक ऐसी समस्या देखी, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल था- सड़कों पर फैला कचरा। 2024 में 31 की उम्र में लाजार ने ‘4क्लीनइंडिया’ कैंपेन शुरू किया। वे अपने साथ गार्बेज बैग रखते और ऋषिकेश से लेकर तमिलनाडु और सिक्किम तक जहां भी जाते, छोटी-छोटी सफाई करते। जल्द ही उन्हें समझ आया कि किसी जगह की सफाई करके उसका वीडियो पोस्ट करना पर्याप्त नहीं। उन्होंने अपने प्रयासों को सोशल मीडिया चैलेंज में बदला और लोगों को आस-पड़ोस में सफाई के लिए प्रोत्साहित करने लगे। अब उनके पेज से करीब 1.5 लाख लोग जुड़े हैं और अपने सफाई अभियानों की तस्वीरें साझा कर रहे हैं। बेंगलुरु में उन्होंने करीब 10 जगहों की सफाई की है, जिनमें जयनगर, जेपी नगर, चर्च स्ट्रीट और कब्बन पार्क के आसपास के इलाके शामिल हैं। गुरुग्राम के सेक्टर 55 में लाजार को सड़कें साफ करते देखकर वहां के निवासियों ने इलाके की निगरानी के लिए वॉट्सएप ग्रुप बना लिए। वे कहते हैं कि ‘उन्हें एक विदेशी को अपनी सड़कें साफ करते देखकर शर्मिंदगी महसूस हुई।’ लाजार का तरीका अनोखा नहीं है। राजस्थान में एक सरकारी कर्मचारी प्रमिला ने झाड़ू उठाकर सफाई के हालात सुधारने में गांववालों की मदद की और अपने गांव में टॉयलेट तक पहुंच 25% से बढ़ाकर 100% कर दी। राजस्थान के अलवर में ही राजेंद्र सिंह ने ग्रामीणों के साथ मिलकर पारंपरिक जल संरक्षण ढांचों को पुनर्जीवित किया, जिससे सूखा प्रभावित इलाकों में नदी का पानी और भूजल वापस लाने में मदद मिली। महाराष्ट्र में चंद्रपुर जिले के सतारा टुकुम के निवासी नगर निगम सफाई कर्मचारियों के बिना ही अपने गांव को साफ रखते हैं। वे अपनी गलियों की सामूहिक जिम्मेदारी लेते हैं। यह इलाका अपनी असाधारण स्वच्छता, सामुदायिक अनुशासन और फोरेस्ट कन्जर्वेशन के प्रयासों के लिए विख्यात है। लाजार के बारे में जो बात मुझे अच्छी लगी, वह यह कि उनका मानना है कि स्वच्छता अभियानों में ‘ज्ञान’ की कम और भावना की जरूरत ज्यादा होती है। उनका सुझाव है कि सफाई को किसी लेक्चर के बजाय फन-एक्टिविटी बनाया जाए, शायद कुछ ‘डांस’ जैसा, ताकि लोग इसमें पार्टिसिपेट करना चाहें। अपनी इस सोच के साथ वे महज सड़कें साफ नहीं कर रहे हैं, वे उस पहचान को बदल रहे हैं, जिसके साथ जोड़ कर लोग सार्वजनिक स्थानों को देखते हैं। हम भारतीय हाइजीन को भलीभांति समझते हैं। यकीनन हम अपने घरों को साफ रखते हैं। हमें बस इसी मानसिकता के साथ घर से थोड़ा बाहर कदम बढ़ाना है, ताकि हमारे शहर भी साफ रहें। हम अपने घर के बाहर सड़क के दो मीटर के हिस्से से, समीप के पार्क से या अपनी दुकान के बगल की दीवार से शुरुआत कर सकते हैं।
अगर एक सर्बियाई मॉडल गार्बेज बैग उठा कर भारतीयों को अपने शहर के प्रति जिम्मेदारी को लेकर सोचने पर मजबूर कर सकता है और कहीं पर कुछ आम भारतीय अपने आस-पड़ोस में बदलाव ला सकते हैं, तो हम भी अपने आसपास ऐसा कर सकते हैं। फंडा यह है कि हमारे आसपास की जगह तब बेहतर नहीं होती जब कोई ‘दूसरा’ उसे बदलने का फैसला करता है। वह तब बेहतर होती है, जब हम तय करते हैं कि यह जगह हमारी है।