एन. रघुरामन का कॉलम:क्या आप कामकाजी महिलाओं के दोहरे बोझ को कम करने के बारे में सोच रहे हैं?
शुक्रवार को अधिकांश अंतरराष्ट्रीय अखबारों के पहले पन्ने पर शीर्ष वरीयता प्राप्त जानिक सिनर की तस्वीर छपी थी, जिन्हें फ्रेंच ओपन जीतने का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। लेकिन इसकी वजह यह नहीं थी कि उन्होंने पिछले दिन कोई मैच जीता था, बल्कि यह थी कि वे विश्व रैंकिंग में 56वें स्थान पर मौजूद हुआन मानुएल सीरुन्दोलो से हार गए थे। अधिकांश अखबारों ने उनकी हार का कारण यह बताया कि “झुलसा देने वाली धूप ने फिलिप-शात्रिये कोर्ट को एक विशाल बैगेट ओवन में बदल दिया था और सिनर की हालत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल हो गया था।’ मैच के बाद सिनर ने कहा, “मुझे याद नहीं आखिरी बार मैं कब इतना कमजोर महसूस कर रहा था। मैं पूरी तरह थक चुका था- मेरा पूरा शरीर जवाब दे रहा था।’ अधिकांश समाचार पत्रों और खेल पत्रकारों ने उनकी हार के लिए भीषण गर्मी को ही जिम्मेदार ठहराया। वास्तव में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी तीसरे सेट में जीत से केवल एक गेम दूर थे, और ठीक उसी समय गर्मी ने उनकी सारी ऊर्जा सोख ली। इसे पढ़ते ही मुझे कुछ विश्वविद्यालय प्राध्यापिकाओं और स्कूल शिक्षिकाओं की याद आ गई, जो बताती रहती हैं कि दिनभर का पेशेवर काम पूरा करने के बाद जब वे अपनी “सेकंड शिफ्ट’ करने घर लौटती हैं, तो गर्मी और थकान उनकी सारी ऊर्जा चूस लेती है। यह ऐसा काम है, जिसमें कोई छुट्टी नहीं मिलती। उनका कहना था कि वे प्रतिदिन इस दबाव के नीचे निढाल हो जाती हैं और उनकी थकान को समझने या बांटने वाला कोई नहीं होता। और वे बिल्कुल सही थीं। अनेक कंजर्वेटिव या पारंपरिक परिवार गर्व के साथ कामकाजी बहू को स्वीकार तो कर लेते हैं, परंतु इसका प्रमुख कारण अकसर उससे मिलने वाला आर्थिक लाभ या सामाजिक प्रतिष्ठा होता है। लेकिन यह स्वीकृति प्रायः शर्तों के साथ आती है। मूल धारणा यही बनी रहती है कि उसके जॉब को पारंपरिक घरेलू बुनावट या परिवार की सुविधाओं में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं डालना चाहिए। समाज और मीडिया द्वारा गढ़े गए सुपरवुमन के मिथक ने आदर्श भारतीय महिला का एक अवास्तविक मानक स्थापित कर दिया है, जो मानो बिना किसी कठिनाई के सब कुछ हासिल कर सकती है। यदि वे सहायता मांगें, घरेलू कामकाज को किसी और से साझा करने का प्रयास करें या अपनी थकान जाहिर करें, तो इसे अकसर उनकी नाकामी या परिवार के प्रति समर्पण की कमी के रूप में देखा जाता है। जिस प्रकार कोई विश्व नंबर एक खिलाड़ी भीषण गर्मी में हमेशा जीत नहीं सकता, उसी प्रकार इन युवा महिलाओं से यह अपेक्षा करना भी अवास्तविक है कि वे एक आधुनिक पेशेवर की तरह कमाएं भी और एक पारंपरिक गृहणी की तरह सेवा भी करें। जब ये कामकाजी महिलाएं रसोइयों, सफाईकर्मियों या आया जैसी घरेलू सहायिकाओं को नियुक्त करके अपनी समय की कमी की समस्या का समाधान करने का प्रयास करती हैं, तो उन्हें अकसर प्रतिरोध या आलोचनात्मक निगरानी का सामना करना पड़ता है। परिवार के सदस्य बाहर के सहायकों द्वारा किए गए कार्य की गुणवत्ता पर सवाल उठा सकते हैं, उसमें अत्यधिक हस्तक्षेप कर सकते हैं, या फिर सूक्ष्म रूप से कामकाजी महिलाओं को यह संकेत देकर उनमें अपराध-बोध पैदा कर सकते हैं कि उनके कारण परिवार उपेक्षित हो रहा है या परायों के हाथ का खाना खा रहा है। दूसरी ओर- विशेषकर उभरते हुए शहरों की टाउनशिप में रहने वाले कुछ वरिष्ठ सदस्य- जो कठोर जेंडर भूमिकाओं वाले युग में बड़े हुए हैं, अकसर उन्हीं पैटर्न्स को आगे बढ़ाते हैं, जिन्हें उन्होंने स्वयं झेला था। यदि सास ने अपने समय में पूरा घर अकेले संभाला था, तो ऐसे परिवारों में नई बहुओं द्वारा काम के बंटवारे की मांग को कभी-कभी अधिकार-बोध या आलस्य के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा, परिवार की शक्ति-संरचनाएं भी किसी नई दुल्हन के लिए घरेलू कामकाज की जिम्मेदारियों को सम्भालना बहुत मुश्किल बना देती हैं। जब किसी व्यक्ति से पर्याप्त आराम या सहयोग के बिना दो फुल-टाइम भूमिकाओं में लगातार बेहतरीन प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है, तो उसका परिणाम मानसिक और भावनात्मक थकान के रूप में सामने आता है। ऐसी महिलाएं एक निरंतर “ऑलवेज़-ऑन’ वाली अवस्था में जीती हैं, जहां उन्हें सही मायनों में आराम करने का बहुत कम अवसर मिलता है। उनका मन लगातार एक मानसिक चेकलिस्ट का प्रबंधन करता रहता है- ऑफिस की डेडलाइंस के साथ-साथ घर की जरूरतों- जैसे किराने का सामान, बच्चों की देखभाल और भोजन की योजना। धीरे-धीरे यह स्थिति एक टाइम-डिसीज़ का रूप ले लेती है, जो वस्तुतः इस मनोवैज्ञानिक अनुभूति को दर्शाती है कि समय कभी भी काफी नहीं होता। इसका परिणाम लगातार भाग-दौड़, अत्यधिक सतर्कता और अवकाश के क्षणों में भी आराम न कर पाने के रूप में सामने आता है। कामकाजी महिलाओं पर पड़ने वाले इस दोहरे बोझ को कम करने के लिए घरेलू स्तर पर तत्काल बदलाव, जीवनसाथी का सहयोग और परिवारों के कम्युनिकेट करने के तरीके में परिवर्तन- इन तीनों की आवश्यकता है। फंडा यह है कि जिस प्रकार खेल जगत अपने किसी चैंपियन के पीछे मजबूती से खड़ा होता है, उसी प्रकार हमें भी अपनी बहुओं के पीछे खड़ा होना चाहिए- क्योंकि वे भी हमारी बेटियां ही हैं।