एन. रघुरामन का कॉलम:क्या आप रिटायरमेंट के गोल्डन रूल्स फॉलो करते हैं?
हाल ही में मेरे दो क्लासमेट्स को भागकर नागपुर जाना पड़ा, क्योंकि तीसरा क्लासमेट रसोई के पीछे उस ढलाननुमा गड्ढे में उल्टा गिर गया, जहां एसी के आउटडोर यूनिट भी रखे जाते हैं। चूंकि गर्मी बहुत तेज थी और लगातार इस्तेमाल की वजह से एसी ठंडी हवा नहीं दे रहा था। उसने ऑनलाइन सर्च किया और सलाह मिली कि आउटडोर यूनिट को पानी से वॉश करें और इंडोर यूनिट की जालियां साफ करें। इंडोर यूनिट साफ करने के बाद उसने सीढ़ी उठा कर रसोई के बाहर फूलों की क्यारी जैसी जगह पर रखी, जहां आउटडोर यूनिट थी। उस संकरी जगह में सीढ़ी लगा कर वह चढ़ा और जेट स्प्रे से यूनिट साफ करने लगा। कोई नहीं जानता इस दौरान क्या गड़बड़ हुई और अस्पताल में भर्ती दोस्त अपनी पत्नी के सामने कुछ भी बताने से इनकार कर रहा है। वह गड्ढे में इसलिए गिरा, क्योंकि उसने रिटायरमेंट का एक बड़ा नियम तोड़ा- सीढ़ी पर चढ़कर ऐसी चीज ठीक करने की कोशिश करना, जिसके लिए असल में किसी प्रोफेशनल को पैसे देने चाहिए। स्कूल के दिनों में हम चारों सबसे अच्छे दोस्त थे, क्योंकि हम साइकिलें ठीक करने में माहिर थे। जैसे आजकल के लड़के क्लास की छात्राओं के फोन रिचार्ज कर देते हैं, उस दौर में हम साइकिलें रिपेयर करते थे। आखिर लड़के तो लड़के होते हैं, इसलिए हंसिए मत। चीजें ठीक करने का ये जुनून हमारी युवावस्था की उस मितव्ययिता से जुड़ा है, जब पैसों की बहुत तंगी होती थी। पूरे महीने के खर्च के लिए हमें सिर्फ एक रुपया मिलता था। हर चीज ठीक करने की आदत ने हमें धीरे-धीरे टूल किट खरीदने को प्रेरित किया। अगर आप हम चारों के घर आएं तो आपको तरह-तरह के स्क्रूड्राइवर, हथौड़े, ड्रिल मशीन, कीलें, कील निकालने के औजार और स्पैनर मिले जाएंगे। स्कूली दिनों में हमें बेकार चीजों से कुछ नया बनाने की आदत थी। धीरे-धीरे यह आदत ऐसी हो गई कि जब प्रोफेशनल नहीं मिलते तो हम खुद ही चीजें रिपेयर करने लगे। छोटे-मोटे इलेक्ट्रिकल काम, स्विच बदलना या लीकेज पाइप ठीक करना। फिर धीरे-धीरे हममें से ज्यादातर की यह आदत कम हो गई, क्योंकि हमारी पोस्टिंग अलग-अलग शहरों में हो गई और परिवार दूसरे शहरों में रहते थे। लेकिन रिटायरमेंट के बाद खुद चीजें ठीक करने की यह इच्छा फिर लौट आई। अगस्त 2018 में जब ‘आईकिया’ ने भारत में पहला रिटेल स्टोर खोला तो हम लोग गेट-टूगेदर के लिए हैदराबाद गए और पूरा दिन आधुनिक जमाने के टूल्स खरीदने में बिताया। हमारे लिए यह किसी तीर्थ यात्रा जैसा था। 4 लाख वर्गफीट के इस विशाल स्टोर के ओपनिंग डे पर वहां भारी भीड़ उमड़ी और ट्रैफिक जाम हो गया। मेरे ससुरजी को स्टूल से गिरने के बाद गंभीर बीमारियां हो गईं थीं, तब से तो मेरी पत्नी ने पूरे परिवार के लिए रिटायरमेंट के कुछ गोल्डन रूल्स बना दिए, जो निम्न हैं। 1. काम के लिए ऊंचाई पर न चढ़ें। सख्त नियम बनाएं कि सीढ़ी-स्टूल पर नहीं चढ़ेंगे। जिन कामों में ऊपर चढ़ना हो, उनके लिए स्थानीय हैंडीमैन को पैसे दें या युवा परिजन की मदद लें। हमारे यहां ऊंचाई पर चढ़ने का काम हमारे ड्राइवर उमेश गुप्ता का होता है।
2. भारी सामान उठाने का काम आउटसोर्स करें। अपने जोड़ों और संतुलन की रक्षा के लिए डीप क्लीनिंग, भारी बागवानी या फर्नीचर खिसकाने जैसे कामों के लिए स्थानीय होम सर्विस वालों को बुलाएं। हमारे यहां इनकी जिम्मेदारी भी ड्राइवर गुप्ता की है।
3. पब्लिक ट्रांसपोर्ट में यात्रा न करें। अगर आपको लगता है कि ज्यादा पैसा खर्च हो रहा है, तो यात्रा कम करें। लेकिन जब भी करें, आराम प्राथमिकता हो। बस या ट्रेन न लें, खासकर मुंबई की लोकल ट्रेन से कतई सफर न करें।
4. रोजमर्रा की जिंदगी आसान बनाएं। जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारियां न लें। पढ़ने, टहलने, नई स्किल सीखने जैसे शौक अपनाएं। ज्यादा तनाव वाले प्रोजेक्ट हाथ में न लें। फंडा यह है कि रिटायरमेंट हमें ‘डू इट योरसेल्फ’ की आजादी दे सकता है, पर कुछ चीजों से बचना चाहिए। क्योंकि 60 की उम्र के बाद शरीर में ही ऐसी कई चीजें होती हैं, जिन्हें ठीक करने की जरूरत पड़ती है।