बोरिया मजुमदार का कॉलम:खेल की दुनिया में नस्लवादी टिप्पणियों की कोई जगह नहीं
कुछ दिनों पहले मैंने सोशल मीडिया पर अर्शदीप सिंह द्वारा तिलक वर्मा की चमड़ी के रंग का मजाक उड़ाने संबंधी एक पोस्ट को देखा। तिलक ने उस बात को सहज रूप से टाल दिया और सोशल मीडिया पर भी इसे सामान्य ढंग से ही लिया गया। लेकिन यही तो समस्या है। हम ऐसी बातों को सामान्य मान लेते हैं, क्योंकि हम इनको लेकर पर्याप्त संवेदनशील नहीं हैं। समस्या केवल अर्शदीप तक सीमित नहीं है। यह एक भारतीय समस्या है, और हम सबने इसे ‘इसमें ऐसी कौन-सी बड़ी बात है’ कहकर स्वीकार कर लिया है। धनराज पिल्लई का ही उदाहरण लीजिए। जब पिल्लई पहली बार परिदृश्य में उभरे थे, तो उन्होंने अपनी प्रतिभा से सबको चकित कर दिया था। उन्हें रोक पाना असम्भव लगता था। लेकिन हॉकी मैचों में उनकी त्वचा के रंग की ओर संकेत करने वाली एक टिप्पणी लगातार सुनाई देती थी। स्वयं पिल्लई ने मुझे यह घटना सुनाई थी तो उन्हें भी इसमें कुछ असामान्य नहीं लगा। बल्कि इसे नॉर्मल माना था। आखिर हम इसी तरह तो बोलते हैं, फिर इसमें इतनी बड़ी बात क्या है? यहां उन नाइजीरियाई फुटबॉल खिलाड़ियों के मुद्दे को भी जोड़ लें, जिन्होंने कोलकाता में खेलते हुए अपना करियर बनाया। उनमें से कुछ आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। लेकिन इससे लोग उन पर रंगभेदी या नस्लवादी टिप्पणी करने से नहीं रुके। चीमा ओकरी इसका उदाहरण हैं। वे भारत में फुटबॉल में खेलने वाले सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से हैं, लेकिन उन्हें भी ‘काला चीता’ कहकर पुकारा जाता था। यह सब इतना स्वाभाविक बना दिया गया है कि हमें इन शब्दों के इस्तेमाल में कोई समस्या दिखाई ही नहीं देती।
शायद अर्शदीप सिंह को नहीं पता कि सीमारेखा कहां खींची जानी चाहिए। उनके लिए यह सब मजाक और हल्की-फुल्की चुहलबाजी का विषय भर हो सकता है। यहां तक कि तिलक वर्मा भी शायद यह नहीं समझ पाए कि इस पर उनकी प्रतिक्रिया कैसी होनी चाहिए, इसलिए उन्होंने बात को वहीं पर छोड़ दिया। लेकिन हमें इस तरह के मामलों में अधिक शिक्षा और संवेदनशीलता की आवश्यकता है, और यह जितनी जल्दी हो, भारत के लिए उतना ही बेहतर होगा। आज भी यदि हम कोलकाता में सप्ताहांत का कोई मैच देखने जाएं- जिसमें कोई अफ्रीकी खिलाड़ी खेल रहा हो- तो लगभग निश्चित है कि कोई न कोई दर्शक उस पर नस्लवादी टिप्पणी करेगा। जहां यह उस खिलाड़ी की जिम्मेदारी है कि वह तुरंत इस बात को रेफरी के संज्ञान में लाए, वहीं वहां मौजूद हर व्यक्ति का भी यह फर्ज है कि वह ऐसे व्यक्ति को रोके और टोके। यह एक सामूहिक अभियान होना चाहिए, जिसे केवल अधिकारियों और प्रशासकों पर नहीं छोड़ा जा सकता। हमारे पास ऐसे लोगों की पूरी जमात है, जो त्वचा के रंग को अपमान करने का अपना विशेषाधिकार मानते हैं। सदियों से हमें इस वायरस की कोई वैक्सीन नहीं मिली है, लेकिन अब समय आ गया है कि हम इसे विकसित करें। यह भी अत्यंत आवश्यक है कि खिलाड़ी इस बुराई के विरुद्ध एकजुट हों, प्रतीकात्मकता से आगे बढ़ें और इस संकल्प को वास्तव में चरितार्थ करें कि नस्लीय अपमान को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दरअसल, जो लोग नस्लीय टिप्पणियों के शिकार हुए हैं लेकिन बोलने से बचते रहे हैं, वे भी इस बुराई को बढ़ावा देने के उतने ही दोषी हैं। उन्हें समझना चाहिए कि मानवीय गरिमा के सामने खेल की कोई कीमत नहीं है, और समाज के प्रति उनकी भी एक जिम्मेदारी है। आने वाले समय में बीसीसीआई और फ्रेंचाइजियों को संवेदनशीलता पर आधारित एक ओरिएंटेशन कोर्स शुरू करने पर विचार करना चाहिए। सोशल मीडिया के इस दौर में- जहां खिलाड़ी हर समय प्रशंसकों और अन्य लोगों की निगाहों में रहते हैं- उन्हें पहले की तुलना में कहीं अधिक सामाजिक और राजनीतिक रूप से सजग होने की आवश्यकता है। पहले यदि ऐसी बातें कही भी जाती थीं, तो वे सार्वजनिक नहीं होती थीं, क्योंकि हर चीज सोशल मीडिया पर नहीं आती थी। लेकिन अब तो एक्स और इंस्टाग्राम पर ही पूरा जीवन जिया जा रहा है। ऐसे में खिलाड़ियों का एक ओरिएंटेशन कोर्स उन्हें ‘क्या करें’ और ‘क्या न करें’ का अंतर स्पष्ट बता सकता है। बीसीसीआई और फ्रेंचाइजियों को संवेदनशीलता पर आधारित एक ओरिएंटेशन कोर्स शुरू करने पर विचार करना चाहिए। सोशल मीडिया के इस दौर में खिलाड़ियों को पहले की तुलना में कहीं अधिक सजग होने की आवश्यकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)