एन. रघुरामन का कॉलम:क्या बच्चों के लिए बहुत ज्यादा सुविधा देना अच्छी बात है?
‘डैडी, आप मुझसे इस गर्म कमरे में सोने की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?’ कॉलेज में दाखिला लेने वाली एक टीनएजर ने अपने पिता से यह सवाल किया। उसने इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाई की थी, जहां हर कमरा एयर-कंडीशंड था। पिता तुरंत वार्डन के पास जाकर बोले, ‘मेरी बेटी ऐसे कमरे में नहीं रह सकती। क्या आप उसे एसी कमरा दे सकते हैं? मैं अतिरिक्त पैसे देने को तैयार हूं।’ वार्डन मुस्कराकर बोले, ‘हमारा संस्थान 60 साल पुराना है और यदि सारे कमरे एसी कर दिए जाएं तो पुरानी वायरिंग इतना लोड नहीं झेल सकती। वायरिंग बदलने के बाद हम एसी देने की योजना बना रहे हैं। इसमें 90 दिन लगेंगे। तब तक बच्चे को एडजस्ट करना होगा।’ वार्डन ने 90 दिन के वेटिंग पीरियड को 89 दिन करने से भी इनकार किया तो पिता ने हार मान ली। यह जमशेदपुर का एक प्रीमियम इन्स्टीट्यूट था, जहां एसी कमरे से ज्यादा जरूरी पढ़ाई थी। तब तक मां अपनी बेटी की अलमारी जमा चुकी थीं, बिस्तर लगा चुकी थीं, सारी किताबें स्टडी-टेबल पर करीने से रख चुकी थीं और उसकी जरूरत की हर टॉयलेटरी उपलब्ध करा चुकी थीं। बीते कम से कम एक दशक से साल-दर-साल यही सीन रहता आया था। कई पैरेंट्स को याद होगा कि जब उनके बच्चों ने कॉलेज के लिए घर छोड़ा तो उन्होंने भी ऐसा ही किया था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। 2026 में कैंपस का सीन बदलता दिख रहा है, कम से कम अमेरिका जैसे विकसित देशों की कुछ यूनिवर्सिटीज में। पिछले सोमवार को कैलिफोर्निया की 18 वर्षीय फ्रेशर जारा मोदी अपने पैरेंट्स के साथ बोस्टन यूनिवर्सिटी पहुंचीं। विशाल कैंपस देखने के बाद वे हाथ में आइस्ड कॉफी लिए जारा के रूम पर लौटे। रूम देख कर उसकी आंखें फटी हुईं और मुंह खुला रह गया। वह बोली कि ‘मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूं। यह बहुत परफेक्ट है।’ वह बिस्तर पर कूदी, गुलाबी और सफेद तकिए को चूमा और यूनिवर्सिटी गार्डन की ओर खुलने वाले स्टाइलिश पर्दों पर उंगलियां फेरने लगी। जारा ने उसका कमरा तैयार करने में अपनी पूरी सुबह खपाने वाले हाउसकीपिंग कर्मचारी को गले लगाया तो पैरेंट्स ने यह रिएक्शन रिकॉर्ड किया। उस कर्मचारी ने अगले तीन साल के लिए पैरेंट्स से दूर जारा का नया घर तैयार कर दिया था। उसने फ्लोरोसेंट लाइट तक लगाई, जिस पर जारा का नाम डिस्प्ले होता था। कभी होटलों में होने वाली रूम-सर्विस जैसी सुविधा कम से कम कुछ विकसित देशों में तो अब कॉलेज कैंपस में भी पहुंच रही है। अमेरिकी कैंपस मार्केट बहुत बड़ा है। नेशनल रिटेल फेडरेशन का अनुमान है कि कॉलेज स्टूडेंट्स कैंपस-रिलेटेड शॉपिंग और सर्विसेस पर अरबों डॉलर खर्च करते हैं। लेकिन यहां सवाल है कि जब कोई 18 साल का बच्चा स्वतंत्र कॅरिअर और भविष्य बनाने कॉलेज में आता है तो उसके लिए कितनी सुविधा वास्तव में बेहतर है?
सुविधा अपने आप में बुरी नहीं है। बेहतर अकॉमोडेशन, हाइजीन, लॉन्ड्री और दूसरी सेवाएं छात्रों का समय बचाकर उन्हें पढ़ाई पर फोकस करने में मदद कर सकती हैं। लेकिन सुविधा और निर्भरता के बीच बहुत बारीक अंतर है। अगर कोई दूसरा व्यक्ति बिस्तर लगाए, कमरा साफ करे, अलमारी जमाए और हर छोटी समस्या का समाधान करे तो बच्चा ये काम खुद करना कब सीखेगा? शायद कॉलेज वह जगह होनी चाहिए, जहां युवा यह समझें कि जिंदगी हमेशा शिकायत करने पर तुरंत समाधान नहीं देती। खाना घर जैसा नहीं हो सकता, कपड़ों का ढेर लग सकता है और रूममेट इरिटेटिंग हो सकता है। हर समस्या को हमेशा खत्म करना जरूरी नहीं है। कुछ तो ऐसे सबक होते हैं, जिन्हें अनुभव किया जाए। पैरेंट्स 18 साल तक बच्चों को हर असुविधा से बचाते हैं। तो अगले तीन-चार साल शायद उन्हें सिखाना चाहिए कि इनका सामना कैसे करें। हमें बच्चों को जो असली लग्जरी देनी चाहिए, वह असुविधा-मुक्त जीवन नहीं, बल्कि असुविधा का सामना करने का आत्मविश्वास है। क्योंकि कैंपस के बाहर की दुनिया में हमेशा ऐसी नहीं होती, जहां एसी, हाउसकीपिंग और फोन कॉल पर इंतजार करते पैरेंट्स मिलें। फंडा यह है कि अगर हम बचपन को जरूरत से ज्यादा सुविधाजनक बनाएंगे तो अनजाने में वयस्क जीवन को उनके लिए ज्यादा मुश्किल बना सकते हैं।