एन. रघुरामन का कॉलम:क्या बच्चों में उग्रता रोकने के लिए हमें सजा को शुगरकोट करना चाहिए?
हम सभी ने बचपन में जरूर सुना होगा कि ‘बेंच पर खड़े हो जाओ।’ यह आम सजा थी। इससे थोड़ी सख्त थी, ‘क्लास के बाहर खड़े रहो।’ खासकर, जब हम उस पीरियड के टीचर को ज्यादा परेशान करते थे। दूसरी सजा में बदतर तब होता, जब आप क्लास के बाहर खड़े हों और प्रिंसिपल राउंड पर आ जाएं। जब मुझे ऐसी सजा मिली तो दो बार टॉयलेट में छिपना पड़ा। तीसरी और सबसे बुरी सजा, जिससे मैं हमेशा डरता था, यह थी कि ‘क्लास के बाद प्रिंसिपल रूम में मिलना।’मैं ऐसी सजा कभी नहीं चाहता था, क्योंकि प्रिंसिपल मेरे पिताजी को जानते थे और उनकी टेबल पर फोन रहता था। वे हमेशा पिताजी के ऑफिस में फोन करने की धमकी देते। उस दिन घर लौटने पर मैं सजा के बारे में बात नहीं करता और ओवरएक्टिंग करता था। इससे मां के सामने भांडा फूट जाता और आखिरकार वे पूछ ही लेती थीं कि ‘क्या आज क्लास में कोई सजा मिली?’ कभी मैं मना कर देता, जिसे वे नजरअंदाज कर देतीं और कभी मान लेता, लेकिन उनसे वादा लेता कि वे पिताजी को नहीं बताएंगी। धीरे-धीरे ये सजाएं बदलकर ‘अ नोट टु पैरेंट्स’ तक पहुंचीं। इसमें छात्र को पैरेंट्स के सिग्नेचर करवाने होते थे, या लिखा होता था कि ‘कल पिताजी को साथ लाना।’ मेरी बेटी के स्कूल से पासआउट होने तक मैंने यह सब देखा। हालांकि, अपने पिता के विपरीत उसे कभी सजा नहीं मिली। वह अपनी मां की तरह समझदार थी। इसके बाद मुझे नहीं पता था कि स्कूलों की सजाएं कैसी हो गईं, जब तक कि मैं अमेरिका नहीं गया। वहां कुछ स्कूलों में अलमारी से दोगुने बड़े कमरे होते हैं और वे उन्हें अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। वे बच्चों को स्कूल एडमिनिस्ट्रेटर के केबिन के पीछे उस कमरे में भेजते हैं और उस जगह को ‘काम डाउन रूम’ कहते हैं। कोई उसे ‘चिल रूम’ तो कोई ‘रीसेट स्पेस’ या ‘सेल्फ-मैनेजमेंट रूम’ कहता है। जबकि कुछ सख्त स्कूल उसे ‘रेगुलेशन स्टेशन’ कहते हैं। यदि पैरेंट्स इस आइसोलेशन पनिशमेंट पर सवाल उठाएं, तो स्कूल उन्हें समझाते हैं कि यह ‘थिंकिंग रूम’ है- ऐसा शब्द, जो माता-पिता को गहराई से सोचने से रोकता है। दिलचस्प यह है कि अब पैरेंट्स के पास ऐसे 45 अलग-अलग शब्द हैं, जिनका इस्तेमाल देशभर के स्कूल करते हैं। वे ‘वेलनेस’, ‘सेल्फ सपोर्ट’, ‘फोकस’ और ‘माइंडफुलनेस’ जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। जबकि पैरेंट्स सोच रहे हैं कि ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है, जब यह जगह अलमारी जैसी छोटी और डरावनी भी है, वहां बुरा बर्ताव करने पर क्लास से हटाए बच्चे को रखा जाता है। अपनी यात्रा के दौरान मैंने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के आसपास काफी समय बिताया, जो मैसाचुसेट्स राज्य में है। इस राज्य के स्कूलों को पैरेंट्स को यह बताने की जरूरत नहीं कि कब उनके बच्चे को ‘टाइमआउट रूम’ में रखा गया। यह प्रथा आज भी जारी है, जबकि पैरेंट्स जोर देकर कह चुके हैं कि इससे बच्चों को गहरा आघात पहुंचता है। कई बार बच्चे डर से मल-मूत्र तक कर देते हैं, तब जाकर पैरेंट्स को सजा के बारे में पता चलता है। एक स्थानीय टीवी न्यूज स्टोरी में बताया गया कि 5 साल का एक ऑटिस्टिक बच्चा 28 मिनट की सजा में उस कमरे से बाहर निकलने के लिए संघर्ष कर रहा था। यह मामला पैरेंट्स के बीच चर्चा का बड़ा विषय बना था। मीका कैमिली नाम की मां ने 8 साल के बेटे के रिकॉर्ड खंगाले तो उनमें कम उपस्थिति और हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर के नोट थे। चौंकाने वाली बात यह थी कि उसमें बच्चे को दो बार ‘टाइमआउट रूम’ में भेजने का भी उल्लेख था। अब वे बेटे के गुस्सैल व्यवहार के लिए स्कूल को दोषी ठहराती हैं। कई पैरेंट्स कहते हैं कि यह जेल है। फंडा यह है कि युवा पीढ़ी छोटी-छोटी बातों पर बहुत ज्यादा संवेदनशील और तुनकमिजाजी होती जा रही है तो स्कूलों को सजा के बारे में फिर से सोचना पड़ेगा। कठोर सजाओं को ‘टाइमआउट रूम’ जैसे चाशनी लपेटे हुए शब्दों में पेश करने से शायद बच्चों की संवेदनशीलता को शांत नहीं किया जा सकता।