एन. रघुरामन का कॉलम:क्या लेट प्रेंगनेंसी के फायदों पर उससे जुड़ी समस्याएं भारी पड़ रही हैं!

Jun 13, 2026 - 06:08
एन. रघुरामन का कॉलम:क्या लेट प्रेंगनेंसी के फायदों पर उससे जुड़ी समस्याएं भारी पड़ रही हैं!
53 साल के एक शानदार परफॉर्मर ने दो दशक से अधिक समय पूरी निष्ठा से काम किया। सहकर्मियों की तुलना में वह कहीं तेजी से कॉर्पोरेट के पायदान चढ़े और आखिरकार बिजनेस के शीर्ष पद तक पहुंचे। लेकिन बीते दो वर्षों में कंपनी के प्रमोटर्स ने उनकी परफॉर्मेंस में गिरावट देखी। वह बेहद दबाव में दिखते, बिजनेस ट्रैवल से बचने लगे और ऑफिस में लंबे समय तक रुकना भी छोड़ दिया था। वह हमेशा असंतुष्ट नजर आते थे। इसकी वजह जानने के लिए कंपनी मालिकों ने एक बाहरी विशेषज्ञ की मदद ली। कंसल्टेंट ने गोपनीय रिपोर्ट में बताया कि उनके असंतोष का कारण वेतन-भत्ते नहीं, बल्कि ये है कि वह अपने बच्चे के साथ क्वालिटी टाइम नहीं बिता पा रहे हैं। वह उस ‘कॉर्पोरेट ट्रैप’ में फंसे थे, जहां हर समय उपलब्ध रहना पड़ता है, बड़ी टीम के साथ लगातार संपर्क में रहना पड़ता है और इसीलिए उनके पास बच्चे के लिए मानसिक ऊर्जा बचती ही नहीं थी। वह लगातार नींद की कमी से जूझ रहे थे और यह उनके ‘उम्रदराज पैरेंट’ होने का परिणाम था। उनका बच्चा जब पैदा हुआ था तो वह 41 के और पत्नी 40 वर्ष की थीं। 12 साल बाद, कॅरिअर के सबसे महत्वपूर्ण दौर और छोटे बच्चे की परवरिश की हाई-एनर्जी डिमांड के बीच संतुलन बना पाना उनके लिए बोझ बन गया है। यह उस व्यापक संकट की झलक है, जिससे आज कई उम्रदराज पैरेंट्स गुजर रहे हैं। आज बहुत-से लोग देरी से पैरेंट्स बन रहे हैं। लेकिन फिर उन्हें निजी समय की कमी, सामाजिक दबाव और गंभीर आर्थिक चुनौतियों जैसी अप्रत्याशित हकीकतों का सामना करना पड़ रहा है। कई लोग ऐसे समय में बच्चों की परवरिश का भारी खर्च उठा रहे हैं, जब उन्हें रिटायरमेंट के लिए बचत बढ़ानी चाहिए या उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं को मैनेज करना चाहिए। नतीजतन, कुछ लोगों को सर्वाधिक कमाई वाले वर्षों में भी अपने प्रोफेशन से पीछे हटने के बारे में सोचना पड़ता है। काम का लगातार दबाव और नींद की कमी का विषाक्त गठजोड़ शारीरिक थकान को तेजी से बढ़ाता है। इसीलिए कई प्रमोटर्स और बॉस उनके बर्नआउट को अकसर ‘असंतोष’ मान लेते हैं। कॅरिअर-ड्रिवन प्रोफेशनल्स का एक बड़ा वर्ग जानबूझकर देर से बच्चे पैदा कर रहा है। अमेरिका में 2025 में कुल जन्मों में 40 वर्ष या उससे अधिक उम्र की महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 4.3% रही। यह 1990 की महज 1.2% हिस्सेदारी की तुलना में नाटकीय बढ़ोतरी है। भारत के नेशनल डेटा बताते हैं कि देशभर के कुल प्रसवों में 40 से 44 वर्ष की महिलाओं के प्रसव 1% होते हैं। हालांकि, केवल राष्ट्रीय औसत ही देखें तो जमीनी हकीकत नजर नहीं आती। महानगरों के फर्टिलिटी क्लिीनिकों की रिपोर्ट कहती है कि कॅरिअर संबंधी महत्वाकांक्षाओं और फाइनेंशियल सिक्योरिटी की चाह में 35 और 40 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में आईवीएफ जैसी उन्नत प्रजनन प्रक्रियाओं की मांग साल-दर-साल 5% बढ़ रही है। यह प्रवृत्ति संकेत है कि अधिक उम्र में मातृत्व हासिल करने की सोच में बड़ा बदलाव आ रहा है। अध्ययन पुष्टि करते हैं कि इन उम्रदराज मांओं को तीखी तुलना झेलनी पड़ती है। उन पर लगातार बाहरी सलाहों और डिजिटल जानकारी की बौछार होती रहती है, जिससे वे व्याकुल हो जाती हैं। पैरेंट्स का दबाव कोई नई बात नहीं। यह पीढ़ियों से चला आ रहा है, लेकिन आज यह कहीं अधिक दखल देने वाला लगता है, क्योंकि आधुनिक एल्गोरिदम ने इससे बच निकलना लगभग असंभव बना दिया है। खासकर इन्फ्लुएंसर्स के सोशल मीडिया अकाउंट्स ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है कि बच्चों की परवरिश अब बेहद जटिल, खर्चीली हो गई है और इसमें सफल होना बेहद मुश्किल है। पहले की पीढ़ियों को पैरेंटिंग के बारे में बिन मांगी सलाह मंदिरों, यात्राओं या सामाजिक आयोजनों में मिलती थी। लेकिन आज पैरेंट्स लगातार ऐसी तस्वीरों से घिरे रहते हैं, जो बताती रहती हैं कि बच्चों के लिए उन्हें क्या करना चाहिए। यह डिजिटल दबाव उनमें अयोग्यता और अपराधबोध का भाव पैदा करता है। अधिकतर ‘सुपरमॉम्स’ की सोशल मीडिया फीड्स इसे और बढ़ाती हैं। जैसे ही कोई उम्रदराज पैरेंट्स थोड़ा आगे बढ़ते हैं कि डिजिटल इकोसिस्टम नई सांस्कृतिक बहस खड़ी कर उनकी एंग्जायटी फिर बढ़ा देता है। फंडा यह है कि निस्संदेह देरी से मां बनने के कुछ खास फायदे हैं, लेकिन लगता है कि इस फैसले से पैदा होने वाली चुनौतियां उन फायदों पर भारी पड़ने लगी हैं। अपने विचार मुझसे साझा कीजिए कि आप अपने आसपास क्या देख रहे हैं।