एन. रघुरामन का कॉलम:जब बच्चों को हमारी जरूरत नहीं रह जाती, तब हमारा दूसरा उद्देश्य क्या होता है?

Aug 9, 2026 - 06:45
एन. रघुरामन का कॉलम:जब बच्चों को हमारी जरूरत नहीं रह जाती, तब हमारा दूसरा उद्देश्य क्या होता है?
वे दिन याद कीजिए जब बच्चा बस यह कह देता था कि मुझे यह चाहिए, और आप किसी तरह थोड़ी-बहुत बचत करके, अपने पति से कुछ छिपाकर उसकी वह इच्छा पूरी करने का रास्ता निकाल लेती थीं। वे दिन याद कीजिए जब बच्चे का शरीर कढ़ाही की तरह तप रहा होता था तो आप पूरी-पूरी रात जागकर उसके माथे पर ठंडी पट्टी बदलती रहती थीं। और वह दिन भी याद कीजिए जब आपका बच्चा अमेरिका चला गया और उसने आपसे कहा कि न्यूयॉर्क में अपार्टमेंट बुक करने के लिए उसके पास डाउन पेमेंट के पर्याप्त पैसे नहीं हैं, तब आपने किसी तरह पति को अपनी रिटायरमेंट सेविंग्स निकालने के लिए यह कहकर मना लिया था, आखिर हमारे बाद सब कुछ उसी के लिए तो है। और फिर, एक दिन कुछ बदल जाता है। अब याद कीजिए कि कैसे आप बार-बार उस मोबाइल फोन को देखती रहती हैं, जो कभी बच्चे की हर छोटी-बड़ी समस्या के लिए बजता रहता था लेकिन अब खामोश पड़ा है। यह खामोशी इसलिए नहीं है कि आपका बच्चा अब आपसे प्यार नहीं करता। लेकिन अब वह बड़ा हो गया है। वह एक वयस्क है, जिसके पास नौकरी है, दूर देश में बैठकों की लंबी शृंखला है; उसका अपना घर है, जीवनसाथी है और उसके अपने बच्चे हैं। चूंकि कई माएं अपने बच्चों की जिंदगी में आए इन पड़ावों को स्वीकार करना भूल जाती हैं, इसलिए उन्हें खामोश पड़ा फोन एक ऐसी जगह की तरह दिखाई देने लगता है, जहां से एक अदृश्य खालीपन शुरू होता है। जो मां दशकों तक पूछती रही थी कि खाना खाया? या क्या-क्या खाया?, वह अब किसी के द्वारा उससे यही सवाल पूछने का इंतजार करती है। जो पिता कभी अपने बच्चे की छोटी-सी समस्या हल करने के लिए गाड़ी उठाकर पूरे शहर में दौड़ते रहते थे, वे अब यह कहने से पहले भी हिचकिचाते हैं कि मेरी पीठ में दर्द हो रहा है। मेरे परिचितों में ऐसे कई पैरेंट्स हैं, जो अकसर मिलते-जुलते और साथ में पार्टी करते हैं, लेकिन जब उनमें से कोई एक कहता है कि मेरे बेटे ने मुझे फोन किया और 45 मिनट तक बात की तो वे अचानक भीड़ में अकेले पड़ जाते हैं। किसी की मां या पिता होने के कई दशकों बाद वे चुपचाप खुद से पूछते हैं कि अगर आज किसी को मेरी जरूरत नहीं है, तो मैं कौन हूं? वे अतीत की यादों में चले जाते हैं, जब पैरेंट्स के रूप में उन्होंने अपनी जिंदगी का लगभग आधा हिस्सा एक ऐसे स्पष्ट उद्देश्य के साथ बिता दिया था, जिसे खोजने की उन्हें कभी जरूरत ही नहीं पड़ी थी। यह सफर आधी रात को सुनाई देने वाली एक नन्ही-सी किलकारी से शुरू हुआ था और स्कूल की यूनिफॉर्म, लंच-बॉक्स, होमवर्क, बुखार, परीक्षाओं, कॉलेज में दाखिले, पहली नौकरी, हार्टब्रेक्स, शादी और बच्चों की सैकड़ों छोटी-छोटी जरूरतों से गुजरता हुआ आगे बढ़ा था- ऐसी जरूरतें, जिन्हें शायद बच्चे खुद भी याद न रखते हों। लेकिन माता-पिता उनमें से हर एक को याद रखते हैं। उन्हें अपने बच्चे की पसंद की हर डिश याद रहती है। वे जानते हैं कि उन पर कौन-सी दवा असर करती है। वे यह भी समझते हैं कि बच्चा कब ठीक होने का दिखावा कर रहा है। वे मैं ठीक हूं और मैं सचमुच ठीक हूं के बीच का फर्क जानते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे वर्षों तक बच्चों की जरूरतों पर प्रतिक्रिया देते रहे हैं- चाहे वे कितनी ही छोटी हों या कितनी ही महंगी। ये तमाम बातें मुझे तब याद आईं, जब मैंने इस सप्ताह राशि खन्ना (2013 की फिल्म मद्रास कैफे की अभिनेत्री) के बारे में पढ़ा। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि वे सही भूमिकाएं चुनने की कोशिश करती हैं, क्योंकि आज दर्शक चाहते हैं कि कहानी में हर किरदार का एक उद्देश्य हो। और वे कितनी सही थीं। आज की अकेली मांएं अचानक उस उद्देश्य को खो देती हैं, जिसके इर्द-गिर्द उनकी पूरी वयस्क जिंदगी निर्मित हुई थी। और सबसे दु:खद पहलू यह है कि बच्चे आज भी अपनी मांओं की मदद करना चाहते हैं, लेकिन मांओं को ही नहीं पता कि मदद मांगें कैसे? शायद वो इसी तरह से गढ़ी गई हैं। पैरेंट्स से उम्मीद की जानी चाहिए कि वो अपनी अलग पहचान बनाएं। कुछ ऐसा सीखें, जिसे वे 30 सालों से टालते आ रहे थे। बच्चों का इंतजार किए बिना किसी जगह पर घूमने जाएं। फंडा यह है कि हर पैरेंट के पास अपने जीवन का कोई दूसरा प्रयोजन भी होना चाहिए और अगर वह बच्चे के दूर जाने से पहले ही शुरू हो जाए तो इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता। हमारे बच्चे हमेशा ही हमारे जीवन का उद्देश्य नहीं बने रहेंगे। उन्हें अपना जीवन भी जीना है और अपने स्वयं के उद्देश्यों को भी पूरा करना है।