एन. रघुरामन का कॉलम:बचपन की हॉबी कभी न छोड़ें, यह आपकी पहचान बन सकती है
याद कीजिए वो चीजें, जो हम बचपन में कलेक्ट करते थे? स्टाम्प, सिक्के, की-चेन, माचिस की डिब्बियां, कंचे, पोस्टकार्ड, सीपियां, टॉय कार, बोतलों के ढक्कन और फैमिली हॉलिडे के दौरान बीच पर मिले अनोखे पत्थर। 8-10 साल की उम्र में हम इन्हें गंभीरता से इकट्ठा करते थे। ऐसा करने के लिए हमें कोई कहता नहीं था। बस हमें कोई चीज दिलचस्प लगती तो हम चाहते कि ऐसी एक मेरे पास भी हो। फिर जिंदगी आगे बढ़ी। पढ़ाई, नौकरी, शादी, बच्चे और जिम्मेदारियों ने उन छोटे शौकों को कोने में धकेल दिया। हमारे कलेक्शन सूटकेसों, मचानों और भूली-बिसरी अलमारियों में गायब हो गए। कुछ नमी से खराब हो गए, कुछ घर की सफाई में फेंक दिए गए और बहुत-से खो गए। अगर हम उन्हें नहीं छोड़ते तो क्या होता? शायद वे कोई अधिक बड़ी चीज बन सकते थे। मैं हमेशा अपनी स्टाम्प कलेक्शन हॉबी के खो जाने का अफसोस करता हूं। उस उम्र में अकसर मुझे कई उन विदेशी रेडियो स्टेशनों से पत्र मिलते थे, जिन्हें मैं सुनता था। मैं उन्हें पत्र लिखता था और बदले में वे मुझे जवाब देते। लेकिन मैंने उन सभी को खो दिया, सिवाय पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल के कुछ पत्रों के। तब वे अविभाजित यूएसएसआर में विदेशी दूतावास में कार्यरत थे। पुणे में पिंपरी-चिंचवड़ के 40 वर्षीय महेश लोणकर को लीजिए। टॉर्चलाइट के प्रति बचपन में शुरू हुआ उनका आकर्षण आज 1200 से ज्यादा फ्लैशलाइट के असाधारण कलेक्शन में बदल चुका है। इनमें कुछ तो एक सदी पुरानी हैं। लोणकर ने अपनी पहली टॉर्च महज 10 साल की उम्र में खरीदी थी। दशकों बाद आज उनके पास ऐतिहासिक और मिलिट्री फ्लैशलाइट्स हैं। इनमें से कुछ तो प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौर की हैं। उनके कलेक्शन में बंदूकनुमा फ्लैशलाइट, बोतल के आकार के मॉडल, इमरजेंसी रेडियो फ्लैशलाइट, हाथ से चलने वाली फ्लैशलाइट, मिनिएचर टॉर्च और गोल्ड-प्लेटेड चीजें भी हैं। उनके कलेक्शन में सबसे कीमती 1905 में बनी एक एवर-रेडी फ्लैशलाइट है, जो उन्होंने नीलामी में 65 हजार रुपए में खरीदी थी। इसमें एक दुर्लभ ‘ग्लव कैच स्विच’ है- एक शुरुआती मैकेनिज्म, जिससे बैटरी से चलने वाली लाइट को चालू रखा जा सकता था। दिलचस्प यह है कि लोणकर ने इन्हें महज कलेक्ट ही नहीं किया। उन्होंने इन्हें रिपेयर और साफ करना भी सीखा, क्योंकि कई पुरानी चीजें उनके पास टूटी-फूटी हालत में पहुंची थीं। उनकी हाॅबी कलेक्शन से परे जाकर नॉलेज में बदल गई। जब बचपन के किसी आकर्षण को प्रोत्साहन दिया जाए तो ऐसा ही होता है।भारत में ऐसे कई उदाहरण हैं। मसलन, अहमदाबाद के वेचार म्यूजियम में 4 हजार से ज्यादा पारंपरिक बर्तन हैं। इनमें कुछ तो सदियों पुराने हैं। रेस्टोरेंटर सुरेंद्र पटेल ने जब देखा कि पुराने बर्तनों को भट्टियों में पिघलाने के लिए भेजा जा रहा है तो उन्होंने 1978 में इन्हें खरीदकर संरक्षित करना शुरू किया। आखिरकार यह कलेक्शन 1981 में एक म्यूजियम बन गया। इसी तरह, पुणे के राजा दिनकर केलकर म्यूजियम में भी पारंपरिक रसोई बर्तनों की एक अद्भुत रेंज संरक्षित है। दुनिया में सिक्कों, स्टाम्प्स, घड़ियों, रेडियो, कैमरों, माचिस की डिब्बियों, पोस्टकार्डों, खिलौनों, फाउंटेन पेन और पारंपरिक हांडियों तक के कलेक्टर्स भी हैं। शुरुआत में किसी साधारण-सी चीज के प्रति जुनून लगने वाला शौक आगे जाकर इतिहास, कारीगरी और संस्कृति का रिकॉर्ड बन सकता है। इसीलिए पैरेंट्स को बच्चों की किसी हॉबी को समय की बर्बादी मानकर खारिज करते हुए शायद सावधान रहना चाहिए। जरूरी नहीं कि हर हॉबी पेशा बने, लेकिन यह ऐसी चीज सिखाती है, जो अकसर किताबें नहीं सिखा पातीं- ऑब्जर्वेशन, धैर्य, जिज्ञासा, रिसर्च और वर्षों तक किसी चीज के प्रति आकर्षण बनाए रखने की क्षमता। पैसा अगर जल्दी निवेश किया जाए तो कंपाउंडिंग के जरिए बढ़ता है। जिज्ञासा भी उसी तरह बढ़ती है। कोई बच्चा 10 साल की उम्र में किसी चीज का कलेक्शन शुरू करता है और 20 वर्षों तक जारी रखता है तो वह सिर्फ चीजें जमा नहीं करता। वह नॉलेज, कहानियां, संपर्क, विशेषज्ञता और आखिरकार एक रेपुटेशन भी जमा करता है। अगली बार कोई बच्चा अजीब सिक्का, पुरानी चम्मच, टूटी घड़ी या बोतल का अनोखा ढक्कन लेकर घर आए तो तत्काल यह मत पूछना कि ‘तुम इन सबका क्या करोगे?’ इसके बजाय पूछना कि ‘तुम्हें इसमें इतना दिलचस्प क्या लगा?’ क्योंकि आज का छोटा-सा कलेक्शन कल का म्यूजियम बन सकता है। फंडा यह है कि कभी-कभी जिस हॉबी को हम 12 साल की उम्र में छोड़ चुके होते हैं, वही 40 की उम्र में वो पहचान बन सकती है, जिसे हम तलाश रहे थे।