एन. रघुरामन का कॉलम:मुनाफे के लिए समस्या को आने से पहले ही पहचानें, समाधान विकसित करें
जब दूसरी कंपनियां अपना बजट फ्रीज कर रही हों और एक कंपनी तेजी से भर्तियां करने लगे तो स्वाभाविक ही यह आपका ध्यान खींचेगा। इसीलिए जब मैंने सुना कि थाईलैंड में अपना मुख्यालय रखने वाला एग्री-टेक स्टार्टअप ‘लिविंग रूट्स’, जिसे अभि अग्रवाल और अविका नरूला ने शुरू किया है, ‘अतिरिक्त लोगों’ की भर्ती कर रहा है तो मुझे अचंभा हुआ कि ऐसा क्यों? जिज्ञासा के चलते हुई खोज में दुनिया भर की ऐसी कंपनियों का पता चला, जिन्होंने किसानों की समस्याओं को पहचान लिया और समाधान तैयार कर रही हैं। लिविंग रूट्स उन्हीं में से एक है। यह कंपनी स्थानीय कचरे, सहजीवी माइक्रोब्स और एआई आधारित डेटा के जरिए रासायनिक खादों के जैविक विकल्प तैयार करती है, ताकि मिट्टी की सेहत सुधरे और पारंपरिक केमिकल्स पर निर्भरता कम हो। दुनिया में उपभोक्ता वस्तुओं की सप्लाई की जीवनरेखा होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करने वाले भू-राजनीतिक तनाव खत्म होते नहीं दिख रहे। ऐसे में खाद की समस्या लंबी चल सकती है। संघर्ष लंबा खिंचा तो दुनिया में फसलें कमजोर और किराना महंगा हो सकता है। यूएन के खाद्य एवं कृषि संगठन ने चेताया है कि अतिरिक्त 4.5 करोड़ लोगों को गंभीर खाद्य असुरक्षा झेलनी पड़ सकती है। चूंकि किसान महीनों, बल्कि सालों पहले से योजना बनाते हैं, इसलिए कई किसान 2027 की उपज का अनुमान लगाने लगे हैं। वहीं, वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि इस साल खाद की कीमतें एक-तिहाई तक बढ़ सकती हैं। इसकी खरीद क्षमता 2022 में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद सबसे खराब स्तर पर पहुंच सकती है। नतीजतन, किसान भारी दबाव में हैं। खासकर इसलिए, क्योंकि व्यापक इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद यूरिया का बड़ा हिस्सा खाड़ी से ही आता है। कृषि कारोबार इसकी मार झेल रहे हैं। कुछ लोग गोबर खाद जैसे पुराने तरीकों पर लौट रहे हैं, वहीं कुछ केमिकल्स पर निर्भरता घटाने वाली नई तकनीकों के प्रयोग कर रहे हैं। इनमें बादाम के छिलकों से बने इनपुट से लेकर उन्नत माइक्रोबियल उत्पाद तक शामिल हैं। ऐसा ही काम कर रही कैलिफोर्निया की ‘नाइट्रिसिटी’ अपनी क्षमता बढ़ा रही है और उसका अनुमानित उत्पादन 2028 तक के लिए बुक हो चुका है। मलेशिया में डेयरी उत्पादक ‘फार्म फ्रेश’ मवेशियों का अपशिष्ट कृमियों को खिलाती है। बदले में कृमि उस घास को उपजाऊ बनाते हैं, जिसे उनकी गायें खाती हैं। हालांकि कंपनी पहले भी ऐसा करती थी, लेकिन इस साल यूरिया की कीमतें बढ़ने से वह इस पर अधिक निर्भर हो गई। कंपनी के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि वे अपनी जमीन पर मुर्गियों की बीट डालते हैं। सच में तो पोल्ट्री खाद विदेशों में फसल बढ़ोतरी के रास्ते तलाश रहे किसानों के लिए सबसे ज्यादा मांग वाला उत्पाद बन गई है। लिविंग रूट्स का दावा है कि उसका ‘फोटोबूस्ट’ नामक उत्पाद केमिकल खाद का इस्तेमाल 50% तक और लागत 20% तक घटा सकता है। बड़ी मात्रा में मुर्गियों की बीट ढोने वाले ट्रांसपोर्टर भी अच्छा पैसा कमा रहे हैं। फिर, फ्रांस का स्टार्टअप ‘टूपी ऑर्गेनिक्स’ है, जो स्कूलों से इंसानी यूरिन इकट्ठा कर उसे ऐसे बैक्टीरियल फीड में बदलता है, जो पौधों की बढ़त में मददगार है। पढ़ने में भले ही यह अजीब लगे, लेकिन यही इस वक्त असल दुनिया में हो रहे समाधान हैं। जब वैश्विक कृषि समुदाय इस किल्लत से निपटने के लिए व्यावहारिक विकल्पों की राह तक रहा है तो बाजार में एक खालीपन भी आ गया है। कारोबार शुरु करने की तैयारी कर रहे पढ़े-लिखे आंत्रप्रेन्योर्स के लिए यही मौका है कि वे खेती की इन समस्याओं का हल निकालकर हालात को अपने पक्ष में बदल लें। लेकिन यह उतना आसान नहीं। इन समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू करना अभी भी बड़ी चुनौती है, क्योंकि दशकों से पारंपरिक खादों पर निर्भर किसान अनजान उत्पादों पर भरोसा करने से हिचकते हैं। कुछ बायोलॉजिकल समाधान स्थिरता की समस्या से भी जूझते हैं। मसलन, तेज बारिश में माइक्रोब्स बह जाते हैं। लेकिन इससे विकल्प तैयार करने की कोशिश में कमी नहीं आनी चाहिए। फंडा यह है कि अगर आप महीनों पहले ही समस्या को पहचान लें और समय रहते समाधान तैयार कर लें तो मुनाफा अपने आप आपके पीछे आएगा।