एन. रघुरामन का कॉलम:सोशल मीडिया को लेकर दुनिया बंटी हुई है, आप किस ओर हैं?
अपने चारों ओर देखिए। आपको कई परिवार दिखेंगे, जो अपने 16 साल से कम उम्र के बच्चों को ऑनलाइन जगत और उसके संभावित नुकसान से बचाने में जुटे हैं। उन्हें यह भी सिखा रहे हैं कि सही इस्तेमाल किया जाए तो यह उपयोगी टूल है। इस काम में उन्हें कई घंटे या कई दिन लगे होंगे, ताकि बच्चों के इस्तेमाल वाले हर डिवाइस को यथासंभव सुरक्षित बना सकें। फिर भी उन पैरेंट्स को लगता है कि बच्चों और उन सेटिंग्स पर नियमित निगरानी जरूरी है। आस-पास देखिए कि सैकड़ों पैरेंट्स ऐसे भी हैं, जो छोटे बच्चों को मोबाइल थमा देते हैं, ताकि वे रोजमर्रा के काम करते समय या खाना खिलाते वक्त उनको तंग न करें। यह हम जैसे पैरेंट्स को साहसी महसूस कराता है कि मानो बच्चों को ‘नहीं’ कहने की हिम्मत सिर्फ हममें ही हो। नजरें घुमाइए। कुछ देश 16 से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। 2026 तक ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और मलेशिया ने 16 से कम उम्र के बच्चों के लिए आधिकारिक देशव्यापी सोशल मीडिया प्रतिबंध लगा दिए हैं। कई अन्य देश भी ऐसे प्रतिबंध लगाने या ऐसे कानून बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। इसी सप्ताह यूके ने भी 16 से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध की योजना को अंतिम रूप दिया है। यूके के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि ‘सोशल मीडिया बच्चों को दुखी कर रहा है। यह बदमाशों के लिए बच्चों को परेशान और अब्यूज करना आसान बना रहा है। यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा सकता है।’ फिर चारों तरफ नजरें डालिए। मेटा, यूट्यूब और स्नैपचैट ने इस प्रतिबंध की आलोचना की है। उनका दावा है कि इससे टीनेजर्स ज्यादा हानिकारक प्लेटफॉर्म्स की ओर जाएंगे। यूट्यूब ने एक बयान में कहा कि ‘सभी पर एक जैसे प्रतिबंध बच्चों को ऐसे क्यूरेटेड, निगरानी वाले और लाभकारी अनुभवों से वंचित कर गुमनाम और कम सुरक्षित सर्च में धकेल देंगे।’ स्नैपचैट का कहना है, ‘टीनेजर्स को परिवार और दोस्तों के साथ प्राइवेट मैसेजिंग से दूर करना उन्हें कम सुरक्षित प्लेटफॉर्म्स की ओर धकेलेगा।’ आखिरी बार चारों तरफ देखिए। 8 से 11 साल के बच्चों के पैरेंट्स को उम्मीद है कि भारत भी इन डिजिटल प्रोडक्ट्स से बच्चों को हो रहे नुकसानों को गंभीरता से लेना शुरू कर देगा। वे खुश हैं कि कुछ देश साहस दिखा कर इन उत्पादों को खुली चर्चा में ला रहे हैं और इनके निर्माताओं को दिखा रहे हैं कि बहुत-से पैरेंट्स इसे और बर्दाश्त नहीं करेंगे। वहीं, 14 साल या उससे अधिक उम्र के बच्चों के वो पैरेंट्स तो उम्मीद छोड़ चुके हैं, जो देख रहे हैं कि उनके बच्चों की जिंदगी मीम्स के इर्द-गिर्द घूम रही है। उन्हें लगता है कि सबसे पहले प्रतिबंध लगाने वाले ऑस्ट्रेलिया के बच्चों की तरह उनके बच्चे भी कोई वीपीएन ढूंढ लेंगे और मनमानी करेंगे। अब कृपया चारों ओर देखना बंद कीजिए। अपने भीतर झांकिए। क्या कुछ पैरेंट्स की तरह आपको भी लगता है कि सोशल मीडिया प्रतिबंध केवल समय की बर्बादी है और वास्तविकता में यह बच्चों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं करता। क्या आपको लगता है कि यह सोशल मीडिया कंपनियों को हर जिम्मेदारी से मुक्त कर देता है? क्या आप सोचते हैं कि बच्चे प्रतिबंध को बायपास करने के तरीके ढूंढ लेंगे और उन्हें परेशान करने वाली कोई चीज दिखे तो भी प्रतिबंध के कारण वे पैरेंट्स या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करने में असहज महसूस करेंगे? या फिर आप मजबूती से सोचते हैं कि ये प्रतिबंध आया तो सही और भविष्य में बच्चे इन दुष्प्रभावों से बचे रहेंगे। मुझे लगता है कि हम सभी सोशल मीडिया के बिना बड़े हुए हैं और हमें तो कुछ नहीं हुआ। अगर बच्चे सावधानी से सोशल मीडिया का इस्तेमाल करें तो यह उन्हें प्रतिस्पर्धी दुनिया में आगे रखने का एक बेहतरीन साधन है। मैं बस यह सोच रहा हूं कि क्या इस प्रतिबंध से पैरेंटिंग को राहत मिल पाएगी? फंडा यह है कि क्या सोशल मीडिया प्रतिबंध कोई रामबाण इलाज है या महज एक काल्पनिक समाधान, या फिर एक ऐसी ‘कैच-22’ स्थिति, जहां विरोधाभासी परिस्थितियों के कारण निकलने का कोई रास्ता नहीं दिखता? आप इस प्रतिबंध के समर्थन में हैं या विरोध में? मुझे जरूर लिखिएगा।