एन. रघुरामन का कॉलम:हमें क्या चाहिए- संस्कृति में बदलाव या सख्त कार्रवाई

May 30, 2026 - 06:05
एन. रघुरामन का कॉलम:हमें क्या चाहिए- संस्कृति में बदलाव या सख्त कार्रवाई
1. ‘मैं डॉक्टर बनना चाहता था। मैं हमेशा अच्छे नंबर लाने के लिए पढ़ाई करता था। लेकिन जापानियों ने मुझे बताया कि पढ़ाई क्यों जरूरी है। वहां शिक्षा का मूल सिद्धांत यह है कि तकनीक में प्रगति जिज्ञासा की वजह से हुई है।’ 2. ‘पूरा देश स्वच्छ है। हमें वहां प्लास्टिक का टुकड़ा भी नहीं दिखेगा। मैं उनकी दयालुता, सहानुभूति और जिम्मेदारी की भावना से बहुत प्रभावित हुआ।’ 3. ‘मैं जापानियों का सिविक सेंस देखकर हैरान रह गया। वहां लोगों के चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती है।’ ये बातें किसी महान शख्सियत ने नहीं कहीं, बल्कि गुरुवार को ये प्रतिक्रियाएं कर्नाटक के उन तीन स्टूडेंट्स की थीं, जो 56 भारतीय छात्रों के समूह के साथ काशिवा स्थित शिबुरा इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गए थे। वहां उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेताओं समेत प्रमुख वैज्ञानिकों की विशेष कक्षाओं में हिस्सा लिया। जापान की प्रमुख यूनिवर्सिटीज और रिसर्च संस्थानों का दौरा किया। जापानी हाईस्कूल छात्रों के साथ सामाजिक गतिविधियों में शामिल हुए और वहां की संस्कृति को महसूस किया। उसी गुरुवार को इस जगह से मीलों दूर कोलकाता में राज्य की नगरीय मामलों की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने घोषणा की कि ‘अगले तीन महीने हम जागरूकता और इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण अभियान चलाएंगे। लोगों से आग्रह करेंगे कि वे सड़कों पर कचरा न फेंकें। तीन माह बाद 1 सितंबर से कचरा फैलाने वालों पर जुर्माना लगाएंगे।’इन बच्चों के लिए सबसे बड़ा सबक था कि वहां के स्कूलों में सिविक रेस्पॉन्सिबिलिटी, नैतिकता, सहानुभूति और धैर्य सिखाने पर ज्यादा जोर देते हैं। यह उस अनुभव से बिल्कुल अलग था, जिसके ये स्टूडेंट आदी थे। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में STEM (साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स), बोर्ड परीक्षाओं और कम उम्र से अंग्रेजी की दक्षता को अत्यधिक प्राथमिकता दी जाती है। भारत में सफलता को अकसर नंबर, रैंक और किताबी ज्ञान से मापते हैं। जबकि जापान में, खासकर शुरुआती और विशेष विकास के चरणों में, सफलता इससे मापी जाती है कि बच्चा अपनी रोजमर्रा की जिंदगी कितने अच्छे-से संभालता है, टीम को कितना सहयोग करता है और कितनी भावनात्मक मजबूती दिखाता है। अगर वहां के पाठ्यक्रम को करीब से देखें तो उसे जानबूझकर ऐसा बनाया गया है, ताकि स्वतंत्र और सिविक-माइंडेड वयस्क तैयार किए जा सकें। वहां कुकिंग और सिलाई भी सिखाई जाती है, जिसे ‘कतैका’ कहते हैं। यह कोई बेकार विषय नहीं, बल्कि ‘होम इकॉनॉमिक्स’ के तौर पर जापान में लड़के और लड़कियों दोनों के लिए अनिवार्य विषय है। स्टूडेंट्स इसे सिर्फ इसलिए नहीं सीखते कि बड़े होकर पैरेंट्स या घरेलू सहायकों पर निर्भर न रहें, बल्कि इसमें वे न्यूट्रिशनल बैलेंस, बजटिंग और कपड़ों की मरम्मत सीखते हैं। फिर आता है संगीत और खेल। वे इसे बौद्धिक विकास, भावनात्मक अभिव्यक्ति और सामूहिक सामंजस्य का जरूरी साधन मानते हैं। जापान में बचपन में भारी अकादमिक परीक्षाओं को जानबूझकर टाला जाता है। वहां मान्यता है कि स्कूल के शुरुआती सालों में बच्चों को परीक्षा के अंकों के आधार पर ‘स्मार्ट’ और ‘स्ट्रगलिंग’ श्रेणियों में बांटने के बजाय उनमें चरित्र, व्यवहार और समाज के प्रति लगाव को विकसित करना चाहिए। जापानी शिक्षा मंत्रालय इन व्यवस्थाओं को स्पष्ट रूप से ‘इकिरु चिकारा’ नामक सिद्धांत के इर्द-गिर्द बुनता है, जिसका अर्थ है- ‘जीने का उत्साह।’ इसका उद्देश्य तीन मुख्य स्तंभों के बीच संतुलन बनाना है। 1. शैक्षणिक योग्यता, महज रटने के लिए नहीं बल्कि समस्या सुलझाने के लिए। 2. समृद्ध मानवीय गुण, यानी नैतिकता, सहानुभूति और नागरिक जिम्मेदारी। 3. स्वास्थ्य और शारीरिक मजबूती, जो दृढ़ता और आत्मअनुशासन लाती है। जापानी स्कूलों का मतलब अकादमिक पढ़ाई से कहीं ज्यादा है। वे चरित्र निर्माण के संपूर्ण तंत्र के जैसे काम करते हैं, जहां नैतिकता, नागरिक कर्तव्य और सख्त सामाजिक अनुशासन को रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल किया जाता है। किताबों से परे स्टूडेंट्स स्कूल चलाने में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं, कठोर क्लब गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। फंडा यह है कि यह लड़ाई नैतिकता और दबाव के बीच की है। अगर आप भावी पीढ़ी के लिए यह जंग जीतना चाहते हैं तो उन्हें स्कूली दिनों में ही सहानुभूति का पाठ पढ़ाना चुनिए, ताकि हमें कार्रवाई के लिए कानून बनाने को मजबूर न होना पड़े।