डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम:क्या दुनिया में आज ऐसी कोई संस्था नहीं, जो दखल दे सके?

May 26, 2026 - 06:10
डॉ. अरुणा शर्मा का कॉलम:क्या दुनिया में आज ऐसी कोई संस्था नहीं, जो दखल दे सके?
विश्व युद्धों के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएन) की स्थापना इसलिए की गई थी, ताकि भविष्य में हिरोशिमा-नागासाकी जैसी विनाशकारी घटनाओं और व्यापक पैमाने पर होने वाले युद्धों को रोकने के लिए बातचीत का मंच तैयार किया जा सके। इसके कुछ सर्वमान्य सिद्धांतों में क्षेत्रों का अधिग्रहण न करना, नागरिकों, रेडक्रॉस और सहायता एजेंसियों को हमले के क्षेत्र से बाहर रखना और उन्हें पहुंच प्रदान करना शामिल था। लेकिन यूक्रेन, ईरान और लेबनान में जो हुआ, वो इन सिद्धांतों के बिलकुल उलट था। यूएन, नाटो और ब्रिक्स सदस्य देशों ने सभी पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने के लिए दखल जरूर दिया, लेकिन यहां तक पहुंचने में उन्हें कई महीने और साल लग गए। क्या आज यह आवश्यक नहीं कि ऐसी स्थिति न बने, इसके लिए यूएन को सशक्त बनाए जाए? यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि सतत विकास लक्ष्यों में बाधा न आए। यूं तो एक चार्टर के जरिए बने यूएन का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, मानवाधिकारों को बढ़ावा देना, सामाजिक और आर्थिक विकास को प्रोत्साहित करना, पर्यावरण की रक्षा करना और आपात स्थितियों में मानवीय सहायता प्रदान करना है। यह संघर्षों को रोकने, अंतरराष्ट्रीय कानून बनाए रखने और सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए वैश्विक प्रयासों के समन्वय जैसे कार्य भी करता है। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान-इजराइल युद्ध, गाजा, लेबनान आदि में यूएन को अपने इन उद्देश्यों की प्राप्ति में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालात ऐसे बन गए कि यूएन के लिए मानवीय सहायता सुनिश्चित करना तक कठिन हो गया और युद्ध-अपराधों की निंदा भी यूएन चार्टर के बजाय देशों के दबदबे के अनुसार की गई। ऐसे में इस संगठन को फिर से ताकतवर बनाने के लिए हमें शुरुआत से विचार करने की जरूरत है। रूस-यूक्रेन युद्ध में यूएन महज कागजी कार्रवाई तक सीमित रहा था। उसने रूस की बिना शर्त-वापसी के प्रस्ताव पारित किए, शांति का फॉर्मूला पेश करने का प्रयास किया। लेकिन यह फॉर्मूला हमले के 4 साल बाद आया, इसलिए प्रभावहीन रहा। मानवीय सहायता सुनिश्चित करने में भी वह विफल रहा, क्योंकि प्रभावितों तक पहुंचने से उसे बार-बार रोका गया। भारी जनहानि होने के बाद जाकर वह 1.3 करोड़ प्रभावितों तक मदद पहुंचा सका। यूएन की इस मूकदर्शक भूमिका के कारण 2025 यूक्रेनवासियों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। फिर 2026 में इजराइल और ईरान के बीच नया मोर्चा खुल गया। इसने वैश्विक व्यापार मार्गों और आवागमन को बाधित किया। मानवाधिकारों का पूर्णत: उल्लंघन हुआ, जिसमें शुरुआत में ही ईरान में स्कूली छात्राओं पर हमला हुआ और लेबनान में भी ऐसी ही घटनाएं सामने आईं। यूएन के अन्य सदस्य भी तभी सक्रिय हुए, जब ऊर्जा सप्लाई रुक गई। यूएन महासचिव के बयान भी संयम रखने जैसी अपील तक सीमित रहे, जबकि उद्देश्य महज अपील करना नहीं था, बल्कि सदस्य देशों को एकजुट होकर यह सुनिश्चित करना था कि यूएन के स्थापित मानदंडों का उल्लंघन न हो। ऐसे में क्या फिर से विचार करने जरूरत नहीं कि यूएन के पास स्वयं की ताकत होनी चाहिए? यूएन का लक्ष्य मानवाधिकार उल्लंघन रोकना और समृद्धि लाना है। लेकिन युद्धों ने इन प्रयासों को बाधित किया और देशों को महंगाई और गरीबी के दुष्चक्र में धकेल दिया है। व्यापार और सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है। नागरिकों की जानें जा रही हैं और उन्हें गरीबी में धकेला जा रहा है। इस सब का दीर्घकालिक असर होगा। अंतरराष्ट्रीय कानून भी इन युद्धों के शिकार बने हैं। बड़ी चिंता इस संघर्ष के अन्य क्षेत्रों में फैलने की है। आज फिर से यूएन और उसकी संस्थाओं को मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई है। पहला कदम दक्षिण अफ्रीका द्वारा अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मानवीय अपराधों के खिलाफ मुकदमा शुरू करना था। इससे संघर्ष को बड़े युद्ध में बदलने से रोकने के लिए कुछ अवसर मिला, लेकिन यह भी ‘कागजी शेर’ ही साबित हुआ। न कोई संकल्प दिखा, न ठोस कार्रवाई की गई। हां, कूटनीतिक संवाद जरूर जारी रहे। लेकिन क्या अब अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मनवाने के लिए यूएन को और ताकतवर बनाने की जरूरत नहीं है? आवश्यकता है कि यूएन सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन हो। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, अमेरिका के साथ ईरान, भारत, द. अफ्रीका को स्थायी सदस्य बनाया जाए। महासभा द्वारा अस्थायी सदस्यों को चुने जाने की व्यवस्था भी जारी रहनी चाहिए। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)