नीरज कौशल का कॉलम:केंद्र और राज्य में एक दल की सरकार होने से क्या होता है?

May 12, 2026 - 06:05
नीरज कौशल का कॉलम:केंद्र और राज्य में एक दल की सरकार होने से क्या होता है?
हाल के सालों में भाजपा ने नियमित रूप से ‘डबल इंजन सरकार’ के नारे का इस्तेमाल किया है। लेकिन कानून के जानकारों का तर्क है कि यह नारा भारतीय शासन-व्यवस्था की संघीय संरचना को कमजोर करता है। इसमें यह संकेत निहित है कि केंद्र और राज्य में अगर अलग-अलग दलों की सरकारें हों तो यह बात राज्य की जनता के हित में नहीं होती। बेशक, इस नारे की विभिन्न प्रकार से व्याख्याएं की जा सकती हैं, लेकिन इसका प्रचलित अर्थ यही है कि जब केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टियों की विचारधारा अलग होती है, तब उनके बीच समन्वय कमजोर रहता है। इस नारे के व्यापक इस्तेमाल से दो प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या यह दावा सच है कि जिन राज्यों की जनता केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को चुनती है, वे कहीं अधिक तेज आर्थिक विकास और बेहतर शासन का अनुभव करते हैं? दूसरा, क्या इस नारे ने भाजपा को दोबारा सत्ता में लाने में सफलता दिलाई है? पहले प्रश्न का उत्तर ‘नहीं’ है, और दूसरे का उत्तर कुछ चुनावों में ‘हां’ है। पहले प्रश्न से शुरू करते हैं और इसका उत्तर हाल के कुछ विधानसभा चुनावों के संदर्भ में देते हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को पिछले वर्ष बिहार और इस वर्ष असम में दोबारा सत्ता मिली। ‘डबल इंजन सरकार’ के तर्क के अनुसार, दोनों राज्यों को तेज आर्थिक प्रगति के चमत्कार के रूप में उभरना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दोनों राज्य देश की आर्थिक सीढ़ी में सबसे निचले पायदानों पर हैं। बिहार की प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे कम है, जबकि बड़े राज्यों में असम की प्रति व्यक्ति आय चौथी सबसे कम है। सुप्रशासन के मामले में भी इन राज्यों को आदर्श नहीं माना जा सकता। दूसरी ओर, भाजपा ने कभी भी केरल या तमिलनाडु में शासन नहीं किया है। ‘डबल इंजन सरकार’ के तर्क के अनुसार, दोनों राज्यों को आर्थिक रूप से बदहाल होना चाहिए था। इसके बिलकुल विपरीत, दोनों राज्य प्रति व्यक्ति आय के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हैं और तमिलनाडु को सबसे बेहतर शासित राज्यों में से एक भी माना जाता है। साथ ही, अकसर ऐसी रिपोर्टें सामने आती रही हैं कि विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों को केंद्र प्रायोजित योजनाओं में भागीदारी करने में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के लिए, बंगाल में तृणमूल के शासनकाल के दौरान राज्य को 2022 से मनरेगा और प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभों से वंचित रखा गया। केंद्र ने व्यापक भ्रष्टाचार, वित्तीय अनियमितताओं और केंद्रीय निर्देशों के अनुपालन में विफलता के आरोपों के आधार पर इन दोनों योजनाओं को रद्द कर दिया। यद्यपि ये आरोप पूरी तरह असत्य नहीं हो सकते, लेकिन अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार की अनियमितताओं के बावजूद फंड्स को निरस्त नहीं किया गया था। बंगाल में यह कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध का संकेत देती है। इसी प्रकार, केंद्र ने तमिलनाडु के लिए समग्र शिक्षा के अंतर्गत स्कूल शिक्षा निधि में 2000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि रोक दी थी। आरोप लगाया गया कि तमिलनाडु ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रावधानों और पीएमश्री योजना का अनुपालन नहीं किया है। संक्षेप में, केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने से आर्थिक विकास तो नहीं होता, लेकिन केंद्र उन राज्यों के प्रति अधिक उदार रवैया अपनाता जरूर पाया जाता है, जहां उसकी अपनी पार्टी सत्ता में होती है। अब दूसरा सवाल। क्या यह नारा सत्तारूढ़ पार्टी को वोट दिलाता है? लोकनीति-सीएसडीएस ने 2014 से 2022 के बीच 22 सर्वेक्षण किए, जिनमें उत्तरदाताओं से पूछा गया कि क्या वे मानते हैं विकास के लिए यह आवश्यक है कि केंद्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी एक हो? 22 में से 5 सर्वेक्षणों में इस कथन से पूर्णतः असहमत उत्तरदाताओं की संख्या सहमत लोगों से अधिक थी; जबकि शेष 17 में इसका उलटा था। सर्वेक्षणों के समय चार राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दल सत्तारूढ़ थे। लेकिन चुनावों के बाद भाजपा और उसके सहयोगी 12 राज्यों में सत्ता में आए। दो राज्यों में भाजपा सत्ता खो बैठी। लब्बोलुआब यह है कि यह नारा भाजपा को चुनाव जिताने में सहायक तो हो सकता है, लेकिन जो राज्य इस नारे का अनुसरण कर भाजपा को चुनते हैं, वहां इससे आर्थिक समृद्धि आने के प्रमाण नहीं हैं। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)