नीरजा चौधरी का कॉलम:क्षेत्रीय दलों में आज दिखाई दे रही अंदरूनी टूट अभूतपूर्व है

Jun 18, 2026 - 06:08
नीरजा चौधरी का कॉलम:क्षेत्रीय दलों में आज दिखाई दे रही अंदरूनी टूट अभूतपूर्व है
तृणमूल कांग्रेस का हैरान करने वाला विघटन बंगाल से ज्यादा दिल्ली में भाजपा को मजबूत करने से जुड़ा है। महाराष्ट्र के विपरीत- जहां 2022 में शिवसेना में विभाजन और बाद में एनसीपी में टूट सरकार बनाने के लिए जरूरी था- बंगाल में ऐसी स्थिति नहीं थी। यहां भाजपा ने वैसे भी अपने दम पर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया था। इसके बावजूद तृणमूल का बिखराव हार के कुछ ही घंटों के भीतर शुरू हो गया और देखते ही देखते राज्य विधानसभा में तृणमूल के दो-तिहाई विधायकों ने अलग होकर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में एक बागी गुट बना लिया। उन्होंने दावा किया कि वही असली तृणमूल हैं। विधानसभा अध्यक्ष ने भी उन्हें विपक्ष के नेता के रूप में मान्यता दे दी। इसके बाद लोकसभा के 20 तृणमूल सांसदों ने भी- जो उसकी कुल संख्या (28) का दो-तिहाई हिस्सा हैं- लोकसभा अध्यक्ष से संपर्क किया और उन्हें सूचित किया कि वे नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर चुके हैं। दसवीं अनुसूची में दिए गए दो-तिहाई और विलय के प्रावधान का उद्देश्य दलबदल विरोधी कानून के तहत संसद की सदस्यता रद्द होने से बचना था। 20 सांसदों का यह विलय एक ऐसी पार्टी में हुआ, जिसका पहले कभी नाम भी नहीं सुना गया था। एनसीपीआई त्रिपुरा की एक छोटी, पंजीकृत, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है। यह पार्टी 2023 में बनी थी और उसने राज्य विधानसभा चुनाव लड़ा था, जिसमें उसे कुल मिलाकर 1200 से भी कम वोट मिले थे। दिलचस्प यह है कि तृणमूल के 20 बागी सांसदों ने भाजपा में विलय करने का विकल्प नहीं चुना। हालांकि समूह का नेतृत्व करने वाली काकोली घोष दस्तीदार ने स्पष्ट कर दिया कि वे एनडीए का समर्थन करेंगे। संभव है भाजपा यह नहीं चाहती हो कि कुछ ही हफ्ते पहले जिस पार्टी के नेताओं ने उसे भ्रष्ट बताया था, उसी के सांसदों को अपने खेमे में शामिल करने से पैदा होने वाली नाराजगी का सामना करना पड़े। इसके बावजूद भाजपा लोकसभा में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए उनके समर्थन की उम्मीद कर रही है। राज्यसभा में तृणमूल के बागियों की रणनीति अलग दिखाई देती है- तीन सांसदों ने सदन और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। संभावना है कि जुलाई में संसद के मानसून सत्र के लिए जब सदन की बैठक होगी, तब हमें अलग लोकसभा और राज्यसभा दिखाई देगी। यह अब स्पष्ट हो रहा है कि भाजपा दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रही है, ताकि महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयकों को पारित कराया जा सके, जो इस साल अप्रैल में पारित नहीं हो सके थे। सत्तारूढ़ दल इस संख्या तक पहुंचने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है। तृणमूल के विघटन से पहले के घटनाक्रम में दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर पार्टी के बागी सांसदों की कई बैठकें हुई थीं। तृणमूल का विभाजन कोई अलग-थलग घटना नहीं है। महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) भी एक और विभाजन के कगार पर खड़ी दिखाई देती है। भाजपा ने हालिया विधानसभा चुनावों में हार का सामना कर चुके डीएमके के प्रति भी एक अलग रणनीति अपनाई है। वह द्रविड़ पार्टी के संपर्क में है ताकि परिसीमन विधेयकों पर उसका समर्थन हासिल किया जा सके। इन विधेयकों की डीएमके सबसे मुखर आलोचक रही है। उसका तर्क है कि इससे दक्षिणी राज्यों को उत्तरी राज्यों की तुलना में नुकसान होगा। उपलब्ध संकेतों के अनुसार, सरकार विधेयकों में बदलाव कर रही है, ताकि डीएमके को साथ लाया जा सके। अगर डीएमके अपनी 22 लोकसभा सीटों के साथ भाजपा के साथ आती है, तो यह भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि हो सकती है। इसमें तृणमूल के 20 (या उससे अधिक) सांसद और संभवतः शिवसेना के 7 सांसद भी जुड़ जाएं- साथ ही वे अन्य लोग जो विधेयकों पर अनुपस्थित रह सकते हैं, मतदान से दूर रह सकते हैं या मुद्दे के आधार पर सरकार का समर्थन कर सकते हैं- तो पार्टी जल्द ही वांछित संख्या तक पहुंच सकती है। बंगाल में 1977 में वाम मोर्चे के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस हाशिए पर चली गई थी। 2011 में ममता के मुख्यमंत्री बनने के बाद वाम मोर्चे के सामने भी अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया था। फिर भी, इन दोनों का उस तरह विघटन नहीं हुआ, जैसा तृणमूल के साथ हुआ है। आज हम क्षेत्रीय दलों में इस तरह का आंतरिक विस्फोट देख रहे हैं, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया। राजनीति तेजी से बदल रही है। पार्टियों में टूट के माध्यम से बहुमत हासिल करना अब न्यू नॉर्मल बन चुका है। आज हम क्षेत्रीय दलों में इस तरह का आंतरिक विस्फोट देख रहे हैं, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया। राजनीति तेजी से बदल रही है। पार्टियों में टूट के माध्यम से बहुमत हासिल करना अब न्यू नॉर्मल बन चुका है। तृणमूल इसकी मिसाल है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)