पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:अहंकार की विदाई में ही संसार के सारे सुख समाए हैं
जिन विवेकानंद जी और स्वामी रामतीर्थ को सारी दुनिया में प्रशंसा मिली, उनको अपने ही देश में तवज्जो नहीं दी गई थी। और ये दोनों कहा करते थे कि प्रशंसा का प्रमाण-पत्र लेना भी हो तो परमात्मा से लो, दुनिया क्या देगी। लेकिन मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी होती है अहंकार, और प्रशंसा अहंकार का भोजन है। अहंकारी व्यक्ति को लगता है सब जगह तारीफ हो, मेरी पूछ-परख हो। दु:ख का एक अदृश्य कारण अहंकार भी है। एक छोटा-सा प्रयोग करके देखिए। मार्कर पेन से कभी बर्फ के छोटे-से टुकड़े पर ‘मैं’ लिखिए और थोड़ी देर देखिए। वह गल जाएगा, धुल जाएगा। एक प्रयोग सांस का भी है। आंखें बंद करें, भीतर से दोनों भौंह के बीच में स्थित आज्ञा चक्र पर दृष्टि डालें और ‘मैं’ शब्द को देखें। फिर गहरी सांस लें और भीतर से आज्ञा चक्र पर ‘मैं’ शब्द को देखें और जब सांस छोड़ें तो उसी ‘मैं’ को गला दें। गलता हुआ देखें। इस क्रिया को तीन-चार बार करिए। आपको अनुभूत होगा कि ‘मैं’ गिर रहा है। ‘मैं’ जैसे-जैसे जाएगा, अहंकार को भी लेता जाएगा। और अहंकार की विदाई में दुनिया के सारे सुख समाए हैं।