पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:काम पूरा होने के बाद बदलाव के प्रति भी जागरूक बने रहें
जिंदगी में कोई भी काम हाथ में लें तो चार चरणों से अपने को गुजारें। पहला- आरंभ। इसमें उत्साह बनाए रखें पूरी सावधानी के साथ, क्योंकि कौन-सा काम किया जाए इसका चयन आप इसी चरण में करेंगे। उसके बाद- मध्य। इस समय काम पर हमारी पूरी पकड़ होनी चाहिए। इस दौर में अपना पूरा अनुभव इसमें झोंक दें। तीसरा- अंत। इस समय स्वयं का संतोष होना बहुत जरूरी है। और यही वह दौर होगा जब हमें अपनी ऊर्जा को रीचार्ज कर लेना चाहिए। चौथा- अंत के बाद पुनः शुरुआत। क्योंकि जीवन में अंत किसी बात का नहीं होता। इस प्रतिस्पर्धा के युग में परिवर्तन बहुत तेजी से होगा। अतः जो भी काम करें उसको क्लाइमेक्स पर ले जाएं, लेकिन उसके बाद परिवर्तन के प्रति जागरूक रहें। जैसे किसी भी कलाकार की प्रस्तुति खत्म होती है तो कला बची रहती है। कला खत्म नहीं होती। व्यासपीठ से कथावाचक जब कथा का समापन करते हैं तो कहते हैं कि कथा कभी समाप्त नहीं होती। वह निरंतर है, विराम लेती है। ऐसे ही कर्मयोग सतत है।