पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:कोई गुरु न मिले तो हनुमान जी को अपना गुरु बनाइए

May 26, 2026 - 06:10
पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:कोई गुरु न मिले तो हनुमान जी को अपना गुरु बनाइए
दुनियादारी के प्रति भ्रम हो तो उसका निपटारा हो भी जाता है, लेकिन जब भ्रम ईश्वर के प्रति होता है तो पूरा जीवन गड़बड़ा सकता है। काकभुशुंडिजी ने एक पंक्ति बोली- निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोई, सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होई। निर्गुण रूप अत्यंत सुलभ, सहज ही समझ में आ जाने वाला है, लेकिन गुणातीत दिव्य सगुण रूप को कोई नहीं जानता। इसलिए उन सगुण भगवान के अनेक प्रकार के सुगम और अगम चरित्रों को सुनकर मुनियों के मन में भी भ्रम हो जाता है। ईश्वर का चरित्र दो प्रकार का है- एक सुगम है, एक अगम है। सुगम यानी सरल, सुविधाजनक और अगम का अर्थ होता है पहुंच से बाहर, समझ से परे, असीम। जब कभी जीवन में ईश्वर के प्रति ऐसी स्थिति हो तो सबसे सरल उपाय है किसी गुरु की शरण में चले जाना। और कोई गुरु न मिले तो हनुमान जी को गुरु बनाइए और हनुमान जी से जुड़कर इस प्रकार के भ्रम से अपने आप को दूर कर लीजिए।