पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:प्रेम, श्रद्धा, स्नेह से जीवन में भक्ति आसानी से उतर आती है
ईश्वर संदेह का नहीं, जिज्ञासा का विषय है। संदेह की जब अति हो जाती है तो लोग अपना अज्ञान भी भगवान पर आरोपित कर देते हैं। हमारा अज्ञान, हमारा अहंकार हमको ईश्वर से दूर कर देता है। काकभुशुंडि जी कह रहे हैं- ते सठ हठ बस संसय करहीं, निज अग्यान राम पर धरहीं। वे मूर्ख हठ के वश होकर संदेह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीराम जी पर आरोपित करते हैं। ऐसा उन्होंने इसलिए कहा कि पक्षीराज गरुड़ को संदेह हो गया था श्रीराम जी के ऊपर। उसके निवारण में काकभुशुंडि जी ने रामचरित उनको सुनाया। ईश्वर से जुड़ने का, उन पर भरोसा करने का सबसे सरल तरीका है- भक्ति की जाए। तीन बातें छंदोबद्ध हो जाएं तो जीवन में भक्ति आसानी से उतर जाती है- प्रेम, श्रद्धा और स्नेह। प्रेम समान लोगों से होता है। यह समतल होता है। श्रद्धा अपने से बड़ों से होती है। स्नेह छोटों के प्रति रहता है। ये तीनों यदि रिद्मिक हो जाएं, एक-दूसरे में घुलमिल जाएं तो भक्ति बन जाती है। भक्त जिज्ञासु तो होता है, पर संदेहग्रस्त नहीं रहता।