पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:मन निरंकुश हो तो परिजनों से हमारे संबंध खराब हो जाते हैं
हमारा मन जहां चाहे, जैसे चाहे, खुद भी दौड़ता है और हमें भी भटकाता है। किसी व्यक्ति-परिस्थिति को देखकर ऐसी लंबी छलांग लगाता है कि हम खुद ही परेशान हो जाते हैं। जब हमारा मन गृहस्थी में निरंकुश होता है, तब परिजनों से हमारे संबंध खराब हो जाते हैं। हमारी सोच निगेटिव हो जाती है, वाणी दूषित हो जाती है। हम अपने ही घर में कुछ ऐसे काम करते हैं, जैसे आजकल बाहर की दुनिया में होते हैं। माना जाता है कि दफ्तरों में, स्कूल-कॉलेज में बुलीइंग बड़ी दु:खदाई है। इसका अर्थ होता है सामने वाले पर अनुचित दबाव, पीड़ा पहुंचाने वाली टिप्पणियां। हम देखते हैं आजकल हमारे बच्चे आपस में, घर-परिवार में बुलीइंग का प्रयोग कर रहे हैं। गहराई से अध्ययन करें तो भारत के परिवारों में आजकल विलेन कैरेक्टर को पसंद किया जा रहा है। जिसका सेल्फ-कंट्रोल नहीं होता, वही खलनायक बनता है। और जिसका होता है, वो नायक बन जाता है। बच्चे खलनायक को लेकर रुचि दिखाने लगे हैं, इसी कारण परिवार अशांत होते जा रहे हैं।