पवन के. वर्मा का कॉलम:परिसीमन जरूरी है, लेकिन इस पर मिल-जुलकर बात हो

Jun 19, 2026 - 06:08
पवन के. वर्मा का कॉलम:परिसीमन जरूरी है, लेकिन इस पर मिल-जुलकर बात हो
सरकार संसद के अगले सत्र में नया परिसीमन विधेयक लाने की योजना बना रही है। ऐसा करने के पीछे मजबूत संवैधानिक और लोकतांत्रिक तर्क मौजूद हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं समय-समय पर चुनावी क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण करती हैं, ताकि प्रतिनिधित्व व्यापक रूप से जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं के अनुरूप बना रहे। लोकतंत्र का आधार यह सिद्धांत है कि प्रत्येक नागरिक के वोट का महत्व समान होना चाहिए। समय के साथ जनसंख्या में बदलाव निर्वाचन क्षेत्रों में विषमताएं पैदा करता है। कुछ सांसद दूसरों की तुलना में बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं। वास्तव में, परिसीमन में पहले ही देरी हो चुकी है। पिछली बड़ी परिसीमन प्रक्रिया 2001 की जनगणना के आधार पर की गई थी, हालांकि लोकसभा में सीटों की संख्या को स्थिर रखा गया था। तब से भारत की जनसंख्या में व्यापक बदलाव आया है। शहरीकरण तेज हुआ है। प्रवास के पैटर्न ने जनसांख्यिकीय स्वरूपों को बदल दिया है। नए आर्थिक केंद्र उभरे हैं। कई स्थानों पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमारेखाएं अब मौजूदा वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करतीं। लेकिन परिसीमन केवल गणित का ही विषय नहीं है। यह जनसंख्या, राजनीतिक शक्ति, संघवाद और राष्ट्रीय एकता के बीच नाजुक संतुलन को प्रभावित करता है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों ने दशकों के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य-सेवा और परिवार नियोजन में भारी निवेश किया है। इनकी जनसंख्या वृद्धि स्थिर हुई है। साथ ही, ये राज्य राष्ट्रीय विकास और कर-राजस्व में प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभरे हैं। यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर किया जाता है, तो संसद में इन राज्यों का राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है। उत्तर भारत के वे राज्य- जहां जनसंख्या वृद्धि अधिक है- आनुपातिक रूप से अधिक प्रतिनिधित्व हासिल करेंगे। यह धारणा पूरी तरह उचित है या नहीं, यह अलग बात है। राजनीति केवल तथ्यों पर आधारित नहीं होती; यह मनोविज्ञान पर भी आधारित होती है। कोई भी लोकतांत्रिक बदलाव उन भावनात्मक संबंधों को कमजोर करने की कीमत पर नहीं होना चाहिए, जो देश को एकजुट रखते हैं। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या परिसीमन को नई जनगणना के बिना आगे बढ़ाया जा सकता है? परिसीमन मूल रूप से जनसंख्या आधारित प्रक्रिया ही है। यदि सटीक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, तो किसी भी प्रक्रिया की शुरुआत से पहले नवीन और विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध होने चाहिए। जनगणना प्रक्रिया पूरी हुए बिना परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करना इस आरोप को जन्म देगा कि यह अधूरी या पुराने आंकड़ों पर आधारित है। इसके अलावा, परिसीमन केवल सीटों की संख्या से जुड़ा विषय नहीं है। इसमें यह तय करना भी शामिल है कि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं कहां होंगी। ऐसे फैसले चुनावी परिणामों को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए, इस जिम्मेदारी के लिए नियुक्त संस्था की विश्वसनीयता पर सभी का भरोसा होना आवश्यक है। इन सभी कारणों से यह जरूरी है कि सरकार सभी दलों के साथ चर्चा के माध्यम से परिसीमन प्रक्रिया पर सहमति बनाए। एक संभावना यह हो सकती है कि इसे कई चुनावी चक्रों में चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए। इससे राजनीतिक व्यवस्थाओं और जनमत को धीरे-धीरे समायोजित होने का अवसर मिलेगा। एक अन्य विकल्प किसी प्रकार का ‘वेटेड-रिप्रजेंटेशन’ हो सकता है। यदि इसे सूझबूझ से करें तो यह लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं होगा। दुनिया के देश अकसर जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व के साथ ऐसे तंत्रों को अपनाते हैं, जो क्षेत्रीय हितों की रक्षा करते हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका की सीनेट में भी जनसंख्या की परवाह किए बिना राज्यों को समान प्रतिनिधित्व दिया गया है। जर्मनी का बुंडेसराट भी इसी तरह संघीय संतुलन के तंत्र को समाहित करता है। भारत को इन मॉडलों की नकल करने की जरूरत नहीं, लेकिन वह निश्चित रूप से इनके पीछे मौजूद मूल विचारधारा से सीख सकता है। उद्देश्य यह होना चाहिए कि जो राज्य विकास के लक्ष्यों को हासिल कर चुके हैं, वे राजनीतिक रूप से नुकसान की स्थिति में न पहुंचें। यह अधिक उचित होगा कि विधेयक को संसद की सिलेक्ट-कमेटी के पास भेजा जाए, जहां सभी की मौजूदगी में इस पर आगे चर्चा की जा सके। देश ने बार-बार यह साबित किया है कि कठिन प्रश्नों का समाधान संवाद, समायोजन और आपसी सम्मान के माध्यम से किया जा सकता है। परिसीमन पर बहस भी ऐसे ही दूरदर्शी नेतृत्व की मांग करती है। परिसीमन की प्रक्रिया में यह तय करना भी शामिल है कि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं कहां होंगी। ऐसे फैसले चुनावी परिणामों को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए, इस जिम्मेदारी के लिए नियुक्त संस्था की विश्वसनीयता पर सभी का भरोसा होना आवश्यक है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)