प्रियदर्शन का कॉलम:फूहड़ता पर हंसने वाला समाज हमने आखिर कैसे रच डाला है?
स्टैंडअप कॉमेडियन प्रणीत मोरे के कार्यक्रम में हिमांशु जांगड़ा और सेजल पवार की स्तब्ध कर देने वाली टिप्पणियों का मामला हो या कुछ समय पहले समय रैना के शो में रणवीर इलाहाबादिया के फूहड़ मजाक का- इन्हें श्लीलता-अश्लीलता या नैतिकता-अनैतिकता की कसौटियों पर कसेंगे तो उस गंभीर सभ्यतागत संकट को पहचान नहीं पाएंगे, जो हमारे समय में बहुत तेजी से घटित हुआ है और बड़ा होता जा रहा है। समाज में कई स्तरों पर टूटन बढ़ी है। पुराने मूल्य बेमानी हो चुके हैं। उनमें छुपे लैंगिक और सामाजिक अन्यायों को हम पहचानने लगे हैं, लेकिन नई मूल्य संहिता हमारे सामने नहीं है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की उचित और जरूरी मांग इस समय एक तरह की आम स्वीकृति हासिल कर चुकी है, लेकिन इस स्वतंत्रता के साथ व्यक्तिगत जिम्मेदारी की जो जरूरत है, वह तय नहीं है। संयुक्त परिवार बिखर चुके हैं, एकल परिवार भी टूट चुके हैं- भावनात्मक रूप से नहीं तो कम से कम भौतिक रूप से। मां-बाप पुराने घरों में बच्चों के इंतजार में हैं और बच्चे अपनी नई नौकरियों में अपनी आजादी का मतलब समझने और अपनी नई हासिल आर्थिक हैसियत से खुशी नाम की वह चीज खरीदने में जुटे हैं, जो उनके अदृश्य अकेलेपन को भर सके। जो शिक्षा इन बच्चों को जीवन के सरोकारों, संघर्षों या सवालों से जोड़ सकती थी, वह अब नहीं बची है। बारहवीं के बाद अच्छे पैसे वाली नौकरी के नाम पर होने वाली खर्चीली पढ़ाई ने इनकी प्राथमिकताएं निर्धारित कर दी हैं। एक चमचमाता दफ्तर इनका घर और समाज दोनों है, जो लैपटॉप की शक्ल में इनके कंधों पर लदा रहता है और काम के तनाव के बीच खाने-पीने-हंसने-जीने के रास्ते बताता रहता है। ये रास्ते स्टैंडअप कॉमेडी से लेकर ओटीटी पर मिलने वाली अच्छी-बुरी फिल्मों, अजीबो-गरीब वीडियो, रील्स और तरह-तरह के प्रलोभनों के बीच बनते हैं। हर दो-तीन सेकंड में बदल जाने वाली कटी-छंटी देहमुद्राओं वाले दृश्य इनके अवचेतन में अस्थायित्व का भाव भरते चलते हैं- नौकरियां भी बदलती रहनी हैं, रिश्ते भी बनते-टूटते रहने हैं, देह और दैहिक संबंधों को भी बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। यहीं से वह समाज बनता है, जो स्त्रीद्वेषी, गाली-गलौज से भरे फूहड़ हंसी-मजाक को कॉमेडी का हिस्सा समझता है और उस पर हंसता दिखाई पड़ता है। दुर्भाग्य से यह प्रक्रिया ऐसे समय चल रही है, जब लड़कियां हिंदुस्तान में पहली बार बिल्कुल बराबरी के स्तर पर अपनी आजादी मांग और चाह रही हैं। इस चीज ने नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ियों के मुकाबले कम से कम लैंगिक बराबरी को लेकर ज्यादा संवेदनशील भी बनाया है। लेकिन पुरानी सामंती सड़ांध और नई आधुनिक लंपटता के बीच विकसित जो मर्दवादी मानस है, वह कहीं अवचेतन में अब भी सक्रिय है और वह इस बराबरी के खिलाफ कई मोर्चों पर उसे अपमानित करता है, लड़कियों को 370 रुपये की बिरयानी में खरीद लेने लायक चीज मानता है। दुर्भाग्य यह भी है कि नए भारत में कोई सांस्कृतिक विमर्श नहीं है- साहित्य, कविता, सृजन के नाम पर बस वायरल वीडियो हैं, जो जीवन में रोमांच पैदा करते हैं। जिस राजनीति का दायित्व यह सांस्कृतिक माहौल बनाना है, वह सांप्रदायिकता, जातिवाद और भ्रष्टाचार के गर्त में डूबी है। उसके लिए दंगा भी एक अवसर है और दंगे के बाद बांटी जाने वाली राहत भी। तो इस पीढ़ी के पास मूल्य कहां से आएंगे? तो इस दिशाहारा, मूल्यहीन पीढ़ी के लड़के-लड़कियां कॉमेडी के नाम पर फूहड़ मजाक करते हैं, माफी मांगते हैं और अवसाद में डूब जाते हैं। घर, परिवार, समाज नहीं हो तो सारे न्याय उस सोशल मीडिया पर करने होते हैं, जो बस लुत्फ लेना जानता है। व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। जो शिक्षा बच्चों को जीवन के सरोकारों, संघर्षों या सवालों से जोड़ सकती थी, वह बची नहीं है। ऐसे में मूल्यहीन पीढ़ी के बच्चे कॉमेडी के नाम पर फूहड़ मजाक करते फिरते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)