प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम:आज दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता क्लाइमेट सत्याग्रह की है
देश इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। जब मैं लोगों से पूछता हूं कि अगले वर्ष गर्मी कम होगी या ज्यादा, तो अधिकांश लोग कुछ पल सोचने के बाद कहते हैं- शायद और ज्यादा। यह उत्तर केवल अनुमान नहीं, एक कठोर सच्चाई है। पृथ्वी पहले से कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रही है। इसलिए यह मान लेना कि अगले साल स्थिति अपने आप सुधर जाएगी, स्वयं को भ्रम में रखने जैसा है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आज हम ऐसा क्या करें जिससे आने वाला समय और भयावह न बने। दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण, तकनीकी विकास, नई नीतियों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों पर लगातार काम हो रहा है। इसके बावजूद जलवायु संकट हमारी आंखों के सामने तेजी से बढ़ रहा है। इसका अर्थ है कि समस्या कहीं अधिक गहरी है। मुझे लगता है कि मानव समाज इस विषय में तीन मूलभूत गलतियां कर रहा है। पहली गलती यह है कि हम प्रकृति के संसाधनों- कोयला, पेट्रोल, डीजल और प्राकृतिक गैस को अपनी पूंजी समझ बैठे हैं। किसी व्यवसाय में यदि आप अपनी पूंजी को ही खर्च करना शुरू कर दें, तो वह अधिक समय तक नहीं चल सकता। प्रसिद्ध पुस्तक "स्मॉल इज ब्यूटीफुल' में ईएफ शूमाकर ने 1973 में ही चेतावनी दी थी कि मानव-समाज पृथ्वी की प्राकृतिक पूंजी को अपनी आय की तरह खर्च कर रहा है। विज्ञान, तकनीक और मशीनें हमने बनाई हैं, उनका उपयोग करना उचित है। लेकिन करोड़ों वर्षों में बने जीवाश्म ईंधन हमने नहीं बनाए। वे प्रकृति की पूंजी हैं। यदि हम उसी पूंजी को लगातार जलाते रहेंगे, तो दिवालियापन निश्चित है। दूसरी गलती यह है कि हम मानकर चल रहे हैं कि हमारे उत्पादन और उपभोग में बढ़ोतरी अनंत काल तक चल सकती है। विज्ञान बढ़ रहा है, तकनीक बढ़ रही है, अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन पृथ्वी नहीं बढ़ रही। उसके संसाधन सीमित हैं। सीमित पृथ्वी पर असीमित उपभोग कभी संभव नहीं हो सकता। लेकिन हमने विकास की पूरी परिभाषा ही अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग पर आधारित कर दी है। तीसरी और शायद सबसे बड़ी गलती यह है कि हम मानते हैं पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की समस्या को सरकारें हल कर देंगी। वास्तविकता यह है कि यह समस्या किसी एक सरकार या उद्योग ने नहीं खड़ी की है। इसे हम सभी ने मिलकर बनाया है। हम जो पहनते हैं, खाते हैं, खरीदते हैं, जितनी बिजली उपयोग करते हैं, जितना यात्रा करते हैं- इन सबका सीधा संबंध कार्बन उत्सर्जन से है। इसलिए समाधान भी केवल सरकारों से नहीं आएगा। जब तक व्यक्ति स्वयं अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक कोई नीति पर्याप्त नहीं होगी। इसीलिए मुझे लगता है कि आज दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता क्लाइमेट सत्याग्रह की है। सत्याग्रह का अर्थ केवल विरोध नहीं, बल्कि सत्य पर आग्रह है। आज का सबसे बड़ा सत्य यह है कि पृथ्वी सीमित है, इसलिए हमारा जीवन और उपभोग भी सीमित होना चाहिए। क्लाइमेट सत्याग्रह का अर्थ है स्वेच्छा से सीमित और जिम्मेदार जीवन अपनाना; अपनी जरूरत और लालच के बीच अंतर समझना; और प्रकृति के संसाधनों का उपयोग अधिकार नहीं, जिम्मेदारी की तरह करना। यदि हम क्लाइमेट सत्याग्रह अपनाते हैं, तो यह हमारी तीनों गलतियों का समाधान बन सकता है। यह हमें असीमित उपभोग की दौड़ से बाहर निकालकर संतुलित जीवन की ओर ले जाएगा। और सबसे महत्वपूर्ण, यह लोगों को दर्शक नहीं बल्कि समाधान का भागीदार बनाएगा। अब समय केवल चर्चा का नहीं, व्यक्तिगत जिम्मेदारी का है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)