ब्रह्मा चेलानी का कॉलम:चीन से मेलजोल बढ़ाकर क्षेत्र को खतरे में डाल रहे हैं ट्रम्प
विदेश-नीतियां रातों-रात नहीं बदलतीं। अकसर उन्हें बदलते बयानों, नौकरशाही के समायोजनों और कूटनीतिक प्राथमिकताओं में हेरफेर के जरिये धीरे-धीरे ध्वस्त किया जाता है। अमेरिका की हिन्द-प्रशांत रणनीति भी इसका अपवाद नहीं है। एक दशक पहले, जापानी प्रधानमंत्री शिन्जो आबे ने स्वतंत्र और खुले हिन्द-प्रशांत के विचार को सामने रखा था। इसके पीछे यह सोच थी कि हिन्द और प्रशांत महासागर ऐसा रणनीतिक क्षेत्र हैं, जिस पर किसी ताकत को हावी होने से रोकने के लिए प्रतिबद्ध लोकतंत्रों का गठबंधन बनाना होगा। बाद में अमेरिका ने भी इस दृष्टिकोण को अपनाया और क्वाड को पुनर्जीवित किया। इसके सदस्यों- ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान, अमेरिका को क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के स्तम्भ माना गया। लेकिन अब डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका और चीन से मिलकर बने जी2 के विचार को आगे बढ़ा रहे हैं। मुक्त और खुले हिन्द-प्रशांत दृष्टिकोण के विपरीत जी2 अवधारणा यह मानती है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों को ही आपसी बातचीत के जरिये क्षेत्रीय संतुलन को गढ़ना चाहिए। यह दृष्टिकोण बहुपक्षीय कूटनीति की कीमत पर द्विपक्षीय सौदेबाजी को बढ़ावा देता है, जिससे मिडिल-पावर्स का रणनीतिक महत्व कम हो जाता है। इसकी स्थिरता काफी हद तक वॉशिंगटन और बीजिंग के नेताओं की व्यक्तिगत केमिस्ट्री और बदलते कैलकुलेशंस पर निर्भर करती है। आज तो ट्रम्प, शी जिनपिंग के प्रति नरम होते दिख रहे हैं, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि कल क्या होगा। इसे ट्रम्प की गैर-परम्परागत कूटनीति का एक और उदाहरण बताया जा सकता है, जो अकसर द्विपक्षीय सौदेबाजी पर जोर देती है। लेकिन उनके प्रशासन ने क्वाड को भी कम प्राथमिकता दी है और उनकी नवीनतम राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में इस समूह का केवल एक बार ही संक्षिप्त उल्लेख किया गया है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने भी इसे फिर से इंडो-पैसिफिक के बजाय केवल पैसिफिक कहना शुरू कर दिया है। यह कोई फौरी कूटनीतिक गड़बड़ी नहीं है। ट्रम्प के राज में खुले तौर पर हिन्द-प्रशांत रणनीति बिखर रही है। पिछले दशक में आबे की हिन्द-प्रशांत दृष्टि ने जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति को आधार दिया था, जिसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना था कि चीन पूर्वी एशिया में सैन्य-दबाव न बनाए। यदि अमेरिका पश्चिमी-प्रशांत पर ध्यान केंद्रित करता है, तो जापान के सामने चीन की समुद्री ताकत का सामना करने का खतरा होगा। इस सबमें भारत भी एक केंद्रीय स्थान रखता है। यह पिछले महीने जापान की प्रधानमंत्री ताकाइची की नई दिल्ली की यात्रा के दौरान स्पष्ट हो गया था, जब उन्होंने और नरेंद्र मोदी ने इंडो-पैसिफिक ढांचे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दोहराया था। वे एआई और महत्वपूर्ण खनिजों से लेकर रक्षा प्रौद्योगिकी तक के क्षेत्रों में सहयोग का विस्तार करने पर सहमत हुए थे। जापान के लिए, भारत सिर्फ एक और रणनीतिक भागीदार नहीं है। अपने विशाल आकार, मजबूत सैन्य शक्ति, गतिशील अर्थव्यवस्था और हिन्द महासागर में अपनी प्रभुत्वशाली स्थिति के साथ भारत हिन्द-प्रशांत वास्तुकला का अडिग पश्चिमी स्तम्भ है। भारत चीन के सामने दो-मोर्चों वाली दुविधा पेश करता है, जो चीनी सैन्य योजनाकारों को अपने फोकस और संसाधनों को दो जगहों पर विभाजित करने के लिए मजबूर करता है। अगर चीन को भारत के साथ अपनी लंबी, तनावपूर्ण हिमालयी सीमा की निगरानी और हिन्द महासागर व्यापार मार्गों की रक्षा न करनी पड़ती, तो वह पश्चिमी-प्रशांत में भारी संख्या में बल केंद्रित कर पाता। इंडो-पैसिफिक से इंडो को हटाकर ट्रम्प प्रशासन ने इस महत्वपूर्ण गतिशीलता की अपनी समझ की कमी को उजागर किया है। जी2 के साथ मिलकर, यह बदलाव चीन के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक और भू-राजनीतिक जीत के समान है। आखिरकार, चीनी नेताओं का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि इंडो-पैसिफिक रणनीति का वास्तविक उद्देश्य चीन को रोकना और एशिया-प्रशांत देशों को अमेरिकी प्रभुत्व के मोहरे बनाना था। वे एक प्रशांत-केंद्रित ढांचे को कहीं अधिक पसंद करेंगे, जिसमें अमेरिका और चीन सीधे बातचीत करें और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां जैसा कहा जाए वैसा करें। (@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)