मनोज जोशी का कॉलम:अमेरिका समर्थक और विरोधी गुटों में संतुलन की चुनौती बड़ी
सोमवार को विदेश मंत्री एस. जयशंकर इंटर-गवर्नमेंटल कमीशन की बैठक के लिए मॉस्को में थे। उन्होंने पुतिन से भी मुलाकात की। इसी दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद के समाधान को लेकर विशेष प्रतिनिधियों की वार्ता के 25वें दौर में शामिल होने बीजिंग जा रहे थे। हालांकि जयशंकर और डोभाल की मुख्य जिम्मेदारी द्विपक्षीय संबंधों के विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़ी है, लेकिन उन्हें 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाली ब्रिक्स समिट की जमीन तैयार करने का दायित्व भी सौंपा गया है। यह बैठक महज औपचारिक नहीं होगी। वैश्विक अस्थिरता के दौर में ब्रिक्स देशों के सामने एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि अमेरिका ईरान के खिलाफ आर्थिक युद्ध की शुरुआत कर रहा है और ईरान ब्रिक्स का सदस्य है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट द्वारा सामने रखी योजना का उद्देश्य ईरान की बची-खुची वित्तीय-लाइफलाइन को काट देना है। विदेशी बैंकों, कंपनियों और सरकारों से कहा गया है कि यदि वे ईरान से व्यापारिक-मौद्रिक संबंध बनाए रखते हैं, तो अमेरिकी सिस्टम तक उनकी पहुंच खत्म कर दी जाएगी। ईरान पहले ही गत 45 वर्षों से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। उसने चेतावनी दी है कि आर्थिक युद्ध जारी रहने पर ईरान होर्मुज के जरिए तेल निर्यात को पूरी तरह रोकने के लिए मजबूर हो सकता है। अब तक ईरान के साथ भारत का काफी व्यापार यूएई के रास्ते होता रहा है, लेकिन यूएई भी अमेरिकी प्रयास में शामिल होगा। इससे ईरान को भारत के चावल, चाय और दवाओं के निर्यात पर असर पड़ सकता है। भारत ईरान के पांच सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में रहा है, हालांकि 2018-19 के बाद से दोनों देशों के बीच व्यापार में 90 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है और अब भारत का निर्यात मुख्यतः उन वस्तुओं तक सीमित है, जिन्हें प्रतिबंधों से छूट मिली हुई है। अमेरिकी पाबंदियों का सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ सकता है, जो ईरान के समुद्री रास्ते से होने वाले तेल निर्यात का लगभग 80-90 प्रतिशत खरीदता है। कुछ मायनों में बीजिंग ही अमेरिकी कार्रवाई का मुख्य निशाना होगा। लेकिन अगर अमेरिका छोटी कंपनियों के बजाय चीन के बड़े वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाता है, तो दोनों देशों के बीच आपसी टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। भारत के विपरीत चीन के पास अमेरिका के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के साधन हैं। पिछले साल भी चीन ने रणनीतिक खनिजों के निर्यात पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद अमेरिका को उसके साथ समझौते की ओर बढ़ना पड़ा था। अन्य ब्रिक्स देशों को भी अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि इसका निशाना ऐसे किसी भी देश या मध्यस्थ को बनाया जा रहा है, जो ईरान को वस्तुओं का व्यापार करने या वित्तीय प्रतिबंधों से बचने में मदद करता है। इस लिहाज से यह कदम अमेरिका और चीन-रूस के नेतृत्व वाले समूह के बीच टकराव को और गहरा करता है। समस्या यह है कि ब्रिक्स अब धीरे-धीरे वैचारिक समूह की बजाय अलग-अलग और कभी-कभी परस्पर प्रतिस्पर्धी हितों वाले देशों के मंच में बदल गया है। यदि समूह ऐसा दस्तावेज जारी करता है, जिसमें अमेरिकी प्रतिबंधों की आलोचना की जाए और डॉलर से दूरी बनाने की बात कही जाए, तो भारत असहज स्थिति में पड़ सकता है। जयशंकर और डोभाल के सामने इसलिए बड़ी जिम्मेदारी है। मॉस्को और बीजिंग में उनकी बातचीत महज द्विपक्षीय कवायद नहीं है; यह ऐसे समय में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की कूटनीतिक तैयारियों का भी हिस्सा है, जब वैश्विक हालात बेहद अस्थिर हैं। ब्रिक्स में चीन, रूस, ईरान जैसे अमेरिका-विरोधी देश शामिल हैं तो सऊदी अरब, मिस्र और यूएई भी हैं, जिनके अमेरिका से करीबी संबंध हैं। लेकिन भारत खुद को अमेरिका-विरोधी खेमे में दिखाना नहीं चाहेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)