रश्मि बंसल का कॉलम:मनुष्यों की तरह सब्जियों की भी अपनी पर्सनैलिटी होती है

Jun 13, 2026 - 06:08
रश्मि बंसल का कॉलम:मनुष्यों की तरह सब्जियों की भी अपनी पर्सनैलिटी होती है
एक अरसे के बाद मैंने सब्जी मार्केट में पैर रखा और मजा आ गया। मोटे-ताजे लाल टमाटर, खिलता हुआ फूलगोभी, हरा-भरा फ्रेश पालक। ऐसा लगा कि हर सब्जी मुझसे बतिया रही है, जैसे कि किसी कार्टून फिल्म ने उन्हें जान दे दी हो। जैसे मनुष्य की अलग-अलग पर्सनैलिटी है, वैसे ही हर सब्जी की भी है। भिंडी थोड़ी इठलाती है- ले लो, मुझे ले लो। घर पर सब पसंद करते हैं मुझे। टमाटर में तो अकड़ है ही- मेरे बिना तो खाना ही नहीं बनेगा। आलू भी इसी कैटेगरी में है पर वो घमंडी नहीं। वो अकेले भी सुखी, दूसरों के साथ भी घुल-मिल जाता है। इसलिए हर किसी को भाता है। बैंगन धीरे से पुकारता है- ले लीजिए ना। कूट-कूट कर भुर्ता जिस दिन बनेगा, मेरा जीवन सफल होगा। उधर करेला देवदास बना बैठा है। लोग उसे ठुकरा देते हैं, कड़वा समझकर। लेकिन एक चुटकी अमचूर की कीमत तुम क्या जानो, बाबू। सही ढंग से बनाओ, तभी तो मेरा स्वाद जानोगे। फ्रेंच बीन्स का अपना अंदाज है, फलियों की मिस यूनिवर्स जो है। लेकिन देखो बेचारी ‘गंवार’ फली को- बिल्कुल अनपढ़, फिगर भी नहीं। सेम इत्यादि अन्य फलियों की बातचीत हल्दी-जीरे तक सीमित है। लेकिन फ्रेंच बीन्स का सोशल सर्कल बहुत बड़ा है। दुनिया के टॉप शेफ्स के साथ उसका उठना-बैठना है। चुलबुली गाजर और कॉन्फिडेंट ककड़ी- दोनों जानते हैं कि इनकी जगह तो फिक्स है। खाने के पहले आप उनका सेवन जरूर करते हैं। उनका दिल भी बड़ा है। सेहत के शौकीन आजकल जाने क्या-क्या खाने लगे हैं। नाजुक-सी, रंग-बिरंगी एनआरआई सब्जियों ने अब मार्केट में अपना स्थान जमा लिया है। ब्रोकली, आइसबर्ग लेट्यूस, जुकीनी अब सब्जीवाले के ठेले पर मिल जाती हैं। यहां तक कि एवोकाडो भी अब देश का डार्लिंग है। इंस्टाग्राम पर उसकी इतनी फ्री पब्लिसिटी हुई कि चाटवाले भी एवोकाडो सेव पूरी बेचने लगे। मगर इस लोकप्रियता की रेस में हमारी देसी सब्जियों का क्या? तुरई, टिंडा, परवल, लौकी- इनका देश प्रेम इतना है कि इन्होंने कभी पासपोर्ट बनवाया नहीं। विदेशी सुपरमार्केट में इनका नामोनिशान नहीं। इनके फैन मिलना आसान नहीं। जहां-जहां ये बनते हैं, जरूर कोई बड़े-बुजुर्ग रहते हैं। वो लौकी-टिंडा, जिन्हें बच्चे मुंह बनाकर खाते हैं- क्या उनके कोई अधिकार नहीं? कब तक वो दबे रहेंगे, आपकी थैली में, आपके फ्रिज में? क्या उनका दिल नहीं करता कि किसी अच्छे रेस्तरां के मेन्यू में उनका नाम दिखे? खैर, सब्जियों के बीच वाद-विवाद तो चलता रहता है। लेकिन उनका असली दुश्मन कौन है? पनीर। हर शादी में, हर पार्टी में, हर फंक्शन में उस हट्टे-कट्टे सफेद स्पंज ने मेन्यू पर कब्जा करा हुआ है। उसके आस-पास लोग मंडरा रहे हैं, ग्रेवी में से चुन-चुन कर खा रहे हैं। उसको कहते हैं शाही पनीर, पनीर लबाबदार, पनीर पसंदा और हमें? मिक्स वेजिटेबल। कौन खाएगा? भाई समय आ गया है कि हम भी एक आंदोलन शुरू करें। आप लोग हमारी कदर कीजिए। मार्केट में आकर लीजिए। यह जो कल्चर है ऐप से मंगाने का, समय आ गया है कुछ समझाने का। प्लास्टिक में कैद हमें वो करते हैं, अंदर ही अंदर से हम मरते हैं। कोई प्यार से हमें सहलाता नहीं, चुन-चुन कर थैली में डालता नहीं। गोदाम के अंधेरे में हम पड़े हुए हैं, हमारे कुछ साथी सड़े हुए हैं। कोई खूब पैसे बना रहा है, छोटा आदमी इसमें मारा जा रहा है। जब हो सके मंडी में आया करो, अपने बच्चों को साथ लाया करो। भिंडी कैसे चुनते हैं उन्हें सिखाना, धनिये और पुदीने में फर्क दिखाना। पुराने जमाने की आउटिंग थी सब्जी बाजार का चक्कर, आते हुए ले आना आटा और शक्कर। यह वो काम था जो जेंट्स भी करते थे, ऑफिस से लौटते हुए थैला भरते थे। अब बड़े शहरों में लोगों के पास टाइम नहीं। ऑनलाइन ऑर्डर करना लगता है सही। खैर मैंने तय किया है हर हफ्ते खुद जाऊंगी। अपनी पसंद की ताजी सब्जियां लाऊंगी। काट कर, घिस कर, कम तेल में पका कर। मिलेगा मुझे सुख खा कर। वैसे पनीर भी अपनी जगह अच्छा है। प्रोटीन उसका सच्चा है। मगर सब्जी को भी हक दीजिए। अपने शरीर को चुस्त कीजिए। जब हो सके मंडी में आया करो, बच्चों को साथ लाया करो। भिंडी कैसे चुनते हैं उन्हें सिखाना, धनिये-पुदीने में फर्क दिखाना। पुराने जमाने की आउटिंग थी सब्जी बाजार का चक्कर, आते हुए ले आना आटा और शक्कर। यह काम जेंट्स भी करते थे, ऑफिस से लौटते थैला भरते थे। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)