विजयदत्त श्रीधर का कॉलम:हिंदी की पत्रकारिता ने एक समृद्ध पाठक-संस्कृति रची है

Jun 4, 2026 - 06:06
विजयदत्त श्रीधर का कॉलम:हिंदी की पत्रकारिता ने एक समृद्ध पाठक-संस्कृति रची है
‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ : यह हिंदी पत्रकारिता की आदि-प्रतिज्ञा है। इसी संकल्प के साथ 30 मई 1826 को हिंदी का पहला समाचार-पत्र "उदन्त मार्तण्ड' प्रकाशित हुआ था। युगलकिशोर शुक्ल को हिंदी का प्रथम सम्पादक होने का गौरव प्राप्त है। जनवरी 1931 तक यही माना जाता रहा था कि हिंदी पत्रकारिता की शुरुआत 1845 में काशी से प्रकाशित होने वाले ‘बनारस अखबार’ से हुई। लेकिन ‘मॉडर्न रिव्यू’ के सहायक सम्पादक ब्रजेन्द्रनाथ बंद्योपाध्याय जब भारतीय भाषाओं की पत्रकार-कला का इतिहास लिख रहे थे, तब उनकी शोध दृष्टि में "उदन्त मार्तण्ड' की फाइल आई। तब यह तथ्य सामने आया कि हिंदी का पहला समाचार-पत्र "उदन्त मार्तण्ड' है। ‘विशाल भारत’ के सन् 1931 के फरवरी, मार्च, अप्रैल और मई चार अंकों में ब्रजेन्द्रनाथ बंद्योपाध्याय के शोध-आलेख प्रकाशित हुए। तदनुसार "उदन्त मार्तण्ड' का प्रवेशांक 30 मई 1826 को प्रकाशित हुआ था। 30×20 सेमी फुलस्केप आकार के आठ पृष्ठों के इस समाचार-पत्र के मुखपृष्ठ पर बड़े अक्षरों में सबसे ऊपर "उदन्त मार्तण्ड' नाम होता था। इसके नीचे संस्कृत में लिखा जाता था- दिवाकान्त कान्तिं बिनाध्वान्तमन्तं नचाप्नोति तद्वज्जगत्यज्ञ लोक:। समाचार सेवामृते ज्ञत्वमाप्तुं नशक्नोति तस्मात्करोमीति यत्नं।। इसका अर्थ है- सूर्य के प्रकाश के बिना जिस तरह अंधेरा नहीं मिटता, उसी तरह समाचार-सेवा के बिना अज्ञ जन जानकार नहीं बन सकते। इसलिए मैं यह समाचार-पत्र प्रकाशनरूपी प्रयत्न कर रहा हूं। अर्थात "उदन्त मार्तण्ड' का तात्पर्य है समाचार-सूर्य। प्रवेशांक में ‘इस कागज के प्रकाशक का इश्तेहार’ शीर्षक से समाचार-पत्र का मंतव्य दिया गया है- "यह "उदन्त मार्तण्ड' अब पहले-पहल हिंदुस्तानियों के हित के हेत जो आजतक किसी ने नहीं चलाया पर अंग्रेजी ओ पारसी ओ बंगले में जो समाचार का कागज छपता है उसका सुख उन बोलियों के जान‍ने ओ पढ़ने वालों को ही होता है और सब लोग पराये सुख सुखी होते हैं जैसे पराये धन धनी होना ओ अपनी रहते पराई आंख देखना वैसे ही जिस गुण में जिसकी पैठ न हो उसको उसके रस का स्वाद मिलना कठिन ही है।' "उदन्त मार्तण्ड' में प्रकाशित समाचारों के जितने भी उद्धरण देखने में आते हैं, उनसे पता चलता है कि सम्पादक को यह ज्ञान था कि पाठकों को किन घटनाओं, प्रवृत्तियों और समाचारों से अवगत कराना जरूरी है। सूचित करना पत्रकारिता का प्रथम कर्त्तव्य है। दूसरा कर्त्तव्य है समाज को शिक्षित और प्रेरित करना। पत्रकारिता को लोकरंजन की दिशा में भी काम करना चाहिए, यह सात्विक अपेक्षा की जाती है। "उदन्त मार्तण्ड' की विचार-दृष्टि में भारत और भारतीयों के हित का महत्वपूर्ण स्थान था। 7 सितम्बर 1826 के अंक में ‘विलायती कपड़ा’ शीर्षक से टिप्पणी लिखी गई है- "इस देश में विलायती कपड़ों की आमदनी किस तरह से साल साल बढ़ती गई वह नीचे के लिखे ब्योरे के देखने से ही समझ पड़ेगा।' नौ साल का ब्योरा देते हुए सम्पादक ने सवाल उठाया- "जरा सोचिए कहां डेढ़ लाख रुपये साल का कपड़ा और कहां साठ करोड़ रुपये वार्षिक का! 115 वर्ष में 4,00,00,00/- प्रति सैकड़ा की वृद्धि!' 4 दिसंबर 1827 को "उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन बंद हो गया। इसका एक कारण यह था कि अन्य भाषाओं के समाचार-पत्रों को कम्पनी सरकार से जैसी सहायता मिलती थी, वह "उदन्त मार्तण्ड' को नहीं मिली। डाकघर से समाचार-पत्र के वितरण की सुविधा भी नहीं मिली। जिन हिंदीभाषियों के हित के लिए युगलकिशोर शुक्ल ने समाचार-पत्र प्रकाशित किया था, उन्होंने भी सहारा नहीं दिया। "उदन्त मार्तण्ड' ने हिंदी पत्रकारिता की ठोस नींव रखी। विगत दो सौ वर्षों में हिंदी पत्रकारिता का आशातीत विस्तार और विकास हुआ है। हिंदी पत्रकारिता ने दो बड़े काम किए। एक, देश और दुनिया के हालात और हलचलों में दिलचस्पी लेने वाला पाठक-वर्ग तैयार किया। दूसरे, भाषा को नया रूप दिया और साफ-सुथरे, सुस्पष्ट और समर्थ गद्य की परंपरा का विकास किया। हिंदी पत्रकारिता के लिए यह गौरव की बात है कि उसके मूर्धन्य सम्पादकों में हिंदीतरभाषी मनीषियों का भी अवदान है। मराठी के माधवराव सप्रे, बाबूराव विष्णु पराडकर, लक्ष्मण नारायण गर्दे; बांग्ला के राजा राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन, अमृतलाल चक्रवर्ती, गुजराती के स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, कन्नड के नारायण दत्त, तेलुगु के बालशैारि रेड्डी प्रभृति मनीषियों की लंबी शृंखला है। भारतेन्दु को हिंदी नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है। हिंदी के शब्द-भण्डार को समृद्ध करने में ‘आज’ (1920, काशी) के सम्पादकों की महती भूमिका है। हिंदी गद्य के विन्यास और वर्तनी की एकरूपता के लिए ‘सरस्वती’ सम्पादक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कठिन साधना की। गणेशशंकर विद्यार्थी का ‘प्रताप’ और माखनलाल चतुर्वेदी का ‘कर्मवीर’ भी हिंदी पत्रकारिता के गौरव हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)