शीला भट्ट का कॉलम:मां के हाथों से बने खाने की याद भुलाई नहीं जा सकती

Jun 20, 2026 - 06:08
शीला भट्ट का कॉलम:मां के हाथों से बने खाने की याद भुलाई नहीं जा सकती
मुझे शायद ही कभी अपने या अपने परिवार के लिए खुद खाना पकाना पड़ा है। भारतीय समाज में किसी भी महिला के लिए यह बहुत ही दुर्लभ अपवाद है। इस अर्थ में मैं विशेषाधिकार प्राप्त हूं। मेरे दिवंगत पति और प्रसिद्ध पत्रकार-लेखक कांति भट्ट को खाना बनाना आता था। जब भी उन्हें अपना पसंदीदा ‘कच्चा-पक्का खाना’ खाना होता, वे अपने लिए खुद पकाते थे। अगर उनके हाथों से लौकी की सब्जी भी अच्छी बन जाती, तो वे उस खुशी को पाठकों से साझा किए बिना नहीं रह पाते। अगले दिन अपने दैनिक कॉलम में वे उसका जिक्र करते। वे भोजन को एक समग्र दृष्टिकोण से समझते थे। हालांकि यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है, लेकिन बिना कड़ी मेहनत किए रोज का खाना थाली में मिल जाना संतुष्टि की कोई गारंटी नहीं है। खासतौर पर, जब से ये ऐप आए हैं, जो ऑनलाइन खाना मंगाने में मदद करते हैं, मुझे यह और अधिक महसूस होने लगा है कि अपना खाना खुद पकाने या अपने प्रियजनों के लिए खाना बनाने में कुछ बहुत सुंदर है। जितना अधिक मैं इन ऐप्स का इस्तेमाल करती हूं, उतना ही मुझे घर के बने खाने की कीमत समझ आती है। और निश्चित रूप से, हम सभी अपनी मां के हाथ के खाने के रसिक होते हैं। मैं भी उन अधिकांश भारतीयों से अलग नहीं हूं, जिनके पास मां के हाथ से बने खाने की अमिट यादें हैं। पिछले चार दशकों में मैं अपने भोजन से कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं रही हूं। इसका बड़ा कारण यह है कि मां एक बेहतरीन कुक थीं। शादी के बाद से मैं कभी भी उनके बनाए अद्भुत व्यंजनों को नहीं भूल पाई हूं। मैंने 1979 में, यानी 47 साल पहले मां का घर छोड़ दिया था, लेकिन मां के हाथ के खाने का स्वाद कभी भी मेरे मुंह से नहीं गया। मेरे पास इस बात का विश्लेषण करने के लिए वैज्ञानिक प्रतिभा नहीं है, लेकिन मैं जानती हूं कि उस खाने के स्वाद की स्मृति क्यों आज भी मेरी आंखों को नम कर देती है। मेरा मानना है कि मांएं खाना बनाते समय अपना दिल उसमें उड़ेल देती हैं। जब जीवन आपको कोई आघात देता है, तो आपको याद आता है कि मां कैसे चुपचाप हमें उसके दंश को कम करने के लिए संभाल लेती थीं। उनका मन लगातार सोचता रहता था और उनके हाथ कोई ऐसा व्यंजन बना देते थे, जो कठिन समय में हमें शांत कर सके। जब मेरा दिल टूटता तो मां मेरे पसंदीदा दहीबड़े बनातीं और हल्की मुस्कान के साथ मुझे परोसतीं। मैं जीवन के उस पड़ाव पर हूं, जहां मुझे अपनी पसंदीदा कार या कपड़े नहीं खरीदने का पछतावा नहीं है। लेकिन मुझे इस बात का गहरा अफसोस है कि मैंने मां से कभी नहीं पूछा कि ‘मेथी नुं वेषण’ बनाने की विधि क्या है? मां मेथी की ताजा पत्तियों को बेसन के आटे के साथ पकाती थीं। वे कभी इसे सूखी डिश की तरह बनातीं और कभी इसमें छाछ मिलाती थीं। वे हींग और राई के बारीक तड़के की मदद से मेथी के स्वाद को संतुलित कर देती थीं। मेरे पति को एक बार इस बात का अफसोस हुआ था कि हमारा रिश्ता उतना परिपूर्ण, परिपक्व या उतना गहराई से रचा-बसा नहीं हो सकता, जितना मेरा रिश्ता मां के साथ है। मैंने पूछा, क्यों? कांति ने कहा, क्योंकि उसे उनके खाने ने मजबूती से बांधे रखा था। मैं आपको मां के हाथों की बनी रोटियों का एक अंदाजा देती हूं। उन्होंने गुजराती रोटली बनाने की कला में पूर्णता हासिल कर ली थी। वे उसे हमेशा गेहूं के आटे से बनाती थीं। मुलायम लोई उनके बेलन के नीचे एक सटीक लय में गोल-गोल घूमती थी। उनका पाटलो हमेशा चूल्हे के पास रखा रहता था। पिछले 55 वर्षों में मुंबई स्थित उनके घर की रसोई में पाटलो की जगह कभी नहीं बदली। जब रोटी को चूल्हे पर सेंका जाता, तो वह एकदम सही गोल आकार की फूली हुई बन जाती। रेशम जैसी मुलायम। वह मेरे मुंह में घुल जाती थी। उनकी रोटियां कागज जितनी पतली होती थीं। मां के हाथों के स्पर्श के बिना मेरे लिए कोई भी भोजन 10 में से 10 नहीं रहा है। शादी के बाद मेरी मां पूरी तरह समझती थीं कि रोज उनके हाथ के खाने से वंचित रहने का मेरा दु:ख क्या है। उनकी रोटली ने मुझे बहुत लाड़-प्यार दिया था। एक बार उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं अपनी पंजाबी मकान मालकिन से वैसी रोटियां बनाने के लिए कहूं, जैसे वे बनाती हैं। मैंने मां से कहा, मैं उनको कैसे समझाऊं कि मुझे रोटली खाना पसंद है, रोटला नहीं! शादी के बाद से मैं कभी भी मां के बनाए गुजराती व्यंजनों, उनके स्वाद और उनकी रोटली को नहीं भूल पाई हूं। मां के खाने की यह चाहत भारत में असामान्य नहीं है। अधिकांश बच्चों के लिए मां का खाना ही पाक-कला का सर्वोच्च मानक होता है। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)